वेदांता अस्पताल के डॉक्टरों की करतूत

आजमगढ़:
जिस आजमगढ़ की पहचान देश और दुनिया में अन्याय और शोषण के विरूद्ध आवाज मुखर करने वाली सरज़मी के रूप में है। जिस कौ़म की बहादुरी तारिख की नज़रों में कैद है। क्या आज यहाँ का मानस नपुंसकता की चादर ओढ़ चुका है। क्या हमारी धमनियों में दौडने वाला लहु पानी हो चुका है। क्या तमसा की रवानी थम गयी है।क्या अन्याय और शोषण के हम आदती बनते जा रहें।

क्या हम व्यवस्था से समझौता करना सीख रहें हैं।
अगर यह सच है तो निश्चित मानिए हम नैय्यर-ए-आज़म की धरती को लजा रहें। हम अब समझौतावादी होते होते नपुंसकता की हद को पार कर रहें हैं। अगर ऐसा नहीं है तो एक अस्पताल जिसकी संगे-बुनियाद के उदघाटन में महामानव और देश की सत्ता का सर्वोच्च प्रतीक रह चुके राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल क़लाम साहब आयें हो, वह मानवता का सेवा घर अब इंसानियत का कत्लगाह बन गया है।जहा जिंदा तो जिंदा मूर्दों से भी वसूली की निर्बाध रवायत चल रही है और जिला प्रशासन तथा शासन खतरनाक चुप्पी ओढ़ ली है। यह सोच कर क़लाम की आत्मा भी धिक्कारती होगी कि जिस इंसानियत की सेवा के लिए उदघाटन का फीता काटा था,वह अस्पताल बदलते दौर में मानवता का कसाईबाड़ा बन गया।जहाँ हर रोज जि़बह होती है इंसानी मजबूरियाँ, संवेदना और चिकित्सा का पवित्र पेशा । और हम अपने हाथ पर हाथ धरे व्यवस्था के भरोसे मौनव्रत धारण कर लेते हैं।आखिर मूर्दों को भी वैल्टीनेटर और आईसीयू में दो दो दिन तक रखकर पैसा बनाने वाली संस्कृति और इसके नाजायज औलादों के विरूद्ध हमारा खून कब खौलेगा।हमारे बर्दाश्त की पराकाष्ठा आखिर कब टूटेगी। हमारा क्रोध हमें कब इस अन्याय के विरूद्ध धिक्कारेगा। हमारी कायरता हमें कब ललकारेगी।

मित्रों! अगर अब भी,हम इन सवालों से भागे तो निश्चित मानिएं हम स्वयं चलती फिरती लाशों में तब्दील हो चुके हैं।हमारी संवेदानों पर तुषारापात हो चुका है।हम समाज को धोखा दे रहे हैं।हम अपने आप को धोखा दे रहें है।आने वाली नश्लों को धोखा दे रहें हैं।हमारी आने वाली नश्ले हमें कायरों की जमात समझेंगी।हमे इतिहास कापुरूषों से ज्यादा स्थान नहीं देगा। अगर अब भी हमारे अंदर आब बची है तो ऐसे अस्पतालों के विरूद्ध हमें सड़कों पर आना होगा।हमे इनको सीज कराना होगा।हमे इनकी मानसिकता और धारणा दोनों बदलनी होगी कि वे अंतिम भगवान नहीं हैं।हमे जिंदा होने का सुबूत देना होगा।हमे इस लूट और डकैती को बंद करानी ही होगी।

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