न्यायपालिका की गिरती साख/अमित त्यागी

जिस तरह से भ्रष्टाचार अन्य क्षेत्रों में हैं वैसे ही न्यायपालिका भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं है। कांग्रेस ने मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध ठीक उसी तरह की लामबंदी की जैसे वरिष्ठ वकील कर रहे थे। राहुल गांधी ने पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं सलमान खुर्शीद जैसे वरिष्ठों की असहमति के बावजूद महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दिया उसके बाद अपनी टीम के द्वारा बार बार यह साबित करने की कोशिश की जैसे लोकतन्त्र खतरे में आ गया है। इसके बाद भारत के इतिहास में पहली बार मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव लाया गया। पर्याप्त संख्या बल एवं उपयुक्त आधार न होने के कारण यह प्रस्ताव उपराष्ट्रपति द्वारा खारिज कर दिया गया। जिस न्यायपालिका पर कांग्रेस द्वारा निशाना साधा गया था उसी के निर्णय के द्वारा कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनी। यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनीतिक हितों के लिए संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल सिर्फ अभी नहीं हो रहा है बल्कि पहले भी होता रहा है। एक विश्लेषण।


जनवरी में चार न्यायाधीशों द्वारा प्रेस कान्फ्रेंस करके संवैधानिक संस्था उच्चतम न्यायालय में गड़बड़ी का आरोप लगाया गया था। इन चारों न्यायाधीश ने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र को निशाने पर लेते हुये प्रमुख वादों को अपनी मनपसंद पीठ में भेजने का आरोप लगाया था। इस नाटकीय घटनाक्रम के बाद पूरे देश में न्यायालय के निर्णयों को संदेह की नज़रों से देखा जाने लगा। उसकी साख पर प्रश्न चिन्ह लगा। इसके बाद सभी न्यायाधीशों के द्वारा आपस में बैठकर समस्या का समाधान निकालने की चर्चाएँ शुरू हो गईं। चारों न्यायाधीशों के द्वारा मामला उठाने पर इसे न्यायिक गुणवत्ता में सुधार की प्रक्रिया की तरह देखा गया। लोगों को लगा कि उच्चतम न्यायालय का यह कांड निचली अदालतों के भ्रष्टाचार में सुधार की भूमिका तय करेगा।
किन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। यह प्रकरण विशुद्ध राजनैतिक प्रकरण था जिसका न्यायिक सुधार से कोई लेना देना नहीं था। यह उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीशों एवं वकीलों के बीच अहम की लड़ाई थी। इसके बाद जब न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने एक साक्षात्कार दिया तो उन्होने स्पष्ट किया कि मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग लाना समस्या का हल नहीं है। उसी समय कांग्रेस दीपक मिश्र के विरुद्ध महाभियोग की तैयारी शुरू कर चुकी थी। प्रेस कान्फ्रेंस करने वाले न्यायाधीशों में एक रहे जस्टिस कुरियन जोसेफ ने इसके बाद मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य न्यायाधीशों को पत्र लिखा एवं केंद्र सरकार द्वारा कालेजियम से भेजे नामों की चुप्पी पर सवाल खड़े कर दिये। कालेजियम द्वारा फरवरी में इन्दु मल्होत्रा एवं के एम जोसेफ के नाम न्यायाधीश नियुक्त करने के लिए भेजे गए थे। फरवरी से अब तक केंद्र सरकार ने न तो इन नामों पर मुहर लगाई और न ही कोई आपत्ति जताई। ऐसा माना जा रहा है कि केएम जोसेफ का उत्तराखंड प्रकरण से जुड़ा होना भाजपा को रास नहीं आ रहा है। दो वर्ष पूर्व जब उत्तराखंड सरकार को बर्खास्त करने का निर्णय आया था तब जोसेफ ने ही उस निर्णय को खारिज कर दिया था। भाजपा की नज़रों में तब से जोसेफ चढ़े हुये थे।
न्यायपालिका के अंदर चल रही इस उथल पुथल के बीच वकीलों का एक समूह भी मुकदमों के आवंटन पर अपनी मुहिम में लगा हुआ था। वह यह चाहता था कि मुकदमों का आवंटन पारदर्शी हो। इस पर कुछ याचिकायेँ भी दायर की गयी। पहली याचिका पर जस्टिस चेलमेश्वर ने यह कहते हुये सुनवाई से इंकार कर दिया कि वह नहीं चाहते हैं कि उनके फैसले को पलट दिया जाये। इसके बाद एक अन्य याचिका पर निर्णय देते हुये उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि कौन सा मामला किस पीठ के पास भेजा जाएगा यह मुख्य न्यायाधीश का विशेषाधिकार है। मुकदमों के आवंटन में वरिष्ठता कोई आधार नहीं है क्योंकि हर न्यायाधीश बराबर है और उसमे वरिष्ठता का कोई प्रश्न नहीं है। इस तरह से न्यायपालिका के अंदुरुनी स्तर पर उठापटक, सुधार, एवं गतिरोध का माहौल था जिसका विधायिका या संसद से कोई लेना देना नहीं था।
कांग्रेस और विपक्ष इस आंतरिक गतिरोध को राजनैतिक रंग देने को तैयार बैठा था। जिस दिन जस्टिस लोया के प्रकरण पर निर्णय आया उसके अगले दिन राहुल गांधी अपने कुंद हथियार लेकर मैदान में कूद पड़े। जिस महाभियोग प्रस्ताव को स्वयं प्रेस कान्फ्रेंस करने वाले जज समस्या का हल नहीं मान रहे थे थे उस महाभियोग का प्रस्ताव राहुल गांधी सदन में ले आये। देश की आज़ादी के 70 साल बाद अगर संविधान की रक्षा की बात पर विपक्ष अड़ा है तो संविधान पर एक बार दुबारा सोचने का समय आ गया है। महाभियोग प्रस्ताव गिरने के बाद अगर संविधान बचाओ रैली निकालने वाले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी शायद अपनी दादी के द्वारा 1975 का वह दौर भूल गए हैं जब संविधान के प्रावधानों का इस्तेमाल इन्दिरा गांधी ने स्वयं को तानाशाह बनाने के लिए किया था। इन्दिरा गांधी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को अपने विरोध में आने के बाद उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए मिले 14 दिन के समय का भी इंतज़ार नहीं किया था। संविधान बचाने की मांग करने वाले राहुल गांधी को पहले आपातकाल का परिदृश्य भी याद करना होगा।
संविधान का काला दिन था आपातकाल :
आपातकाल की घटना कोई एक दिन में घटित नहीं हुयी थी बल्कि यह तानाशाह बनने की तरफ बढ़ रही इन्दिरा गांधी के घटनाक्रम की परिणीती थी। बांग्लादेश पर विजय के बाद इन्दिरा गांधी इतनी ज़्यादा अति आत्मविश्वास की शिकार हो गयीं थीं कि लोकतान्त्रिक विरोध भी उन्हे स्वयं का विरोध लगने लगा था। इन्दिरा गांधी ने बैंको का राष्ट्रीयकरण किया था। जब इस मामले पर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई हुयी तो 1970 में अपने फैसले में न्यायालय ने इन्दिरा गांधी के उस फैसले (जिसमे पचास करोड़ या उससे ज़्यादा कारोबार वाले चौदह बैंको का राष्ट्रियकरण रद्द करने का फैसला था ) को इस आधार पर रद्द कर दिया कि इसमे बैंक को मुआवजा देने का प्रावधान नहीं था । कुल ग्यारह न्यायाधीश वाली इस पीठ में सिर्फ एक न्यायाधीश जस्टिस ए एन रे ने इस फैसले का विरोध किया था। इसके बाद कुछ स्वतंत्र एवं साम्य विचारधारा वाले दलों से मिल रही चुनौतियों के चलते इन्दिरा गांधी ने एक अध्याधेश पारित किया कि प्रिवी पर्स को समाप्त कर दिया जाये। उच्चतम न्यायालय ने दिसम्बर 1970 के अपने फैसले में उसे भी खारिज कर दिया।
इस तरह इन्दिरा गांधी संवैधानिक संस्था न्यायालय के द्वारा दिये गये फैसलों से तिलमिलाना शुरू हो गईं। उनके अंदर तानाशाही का भाव इस कदर घर कर रहा था कि उन्होने जस्टिस हेगड़े और जस्टिस ग्रोवर जैसे वरिष्ठों को दरकिनार करते हुये अपने चहेते जस्टिस ए एन रे को मुख्य न्यायाधीश बना दिया। इसी क्रम में 1973 के शुरुआत दिनों में महंगाई और भ्रष्टाचार का मुद्दा गरमाने लगा। गुजरात में इंजीनियरिंग कालेज में मेस के बिल मे वृद्धि एवं बिहार मे शैक्षणिक सुधार के लिये आंदोलन तेज़ हो गये। यह जेपी नारायण का समय था और जनता उनके साथ थीं। सरकार का विरोध काफी तेज़ था। इन सबके बीच में इन्दिरा गांधी के लोकसभा क्षेत्र में उनके विरोधी प्रत्याशी रहे राजनारायन ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इन्दिरा गांधी की जीत को चुनौती देती हुयी एक याचिका डाल रखी थी जिसमे इन्दिरा गांधी पर आरोप था कि उन्होने चुनावी मशीनरी का दुरुपयोग और सीमा से अधिक पैसा खर्च करते हुये चुनाव जीता है। इसके साथ ही एक आरोप यह भी था कि उन्होने मतदाताओं को पैसा देकर खरीदा है। इस याचिका पर 12 जून 1975 को फैसला आया। इन्दिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता खत्म कर दी गयी। छह साल तक उनके किसी भी पद पर रहने पर रोक लगा दी गयी। इन्दिरा गांधी ने इस फैसले के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय मे अपील की किन्तु जेपी नारायण का आंदोलन अपने चरम पर था और 25 जून 1975 को पूरे देश मे आंदोलन का आवाहन कर दिया गया।
जनता के लोकतान्त्रिक अधिकार को इन्दिरा गांधी भूल गयीं और उस दिन वह संसद भी नहीं गयीं। सत्ता जाने के खतरे को भाँपते हुये उन्होने अपने कानूनी सलाहकार एवं पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे एवं अन्य को बुलाया। इसके बाद राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद से पहले रात के नौ बजे एक मुलाकात की एवं इसके बाद रात मे सवा ग्यारह बजे इन्दिरा गांधी के सचिव आर के धवन राष्ट्रपति भवन पहुंचे। राष्ट्रपति ने इस पर हस्ताक्षर कर दिये। ऐसा कहा जाता रहा है कि राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अहमद ने इन्दिरा गांधी के उकसावे में हस्ताक्षर तो कर दिये थे किन्तु रात भर इसके बाद वह सो नहीं पाये। उनको एहसास हुआ कि शायद उन्होने एक बड़ी एतेहासिक भूल कर दी है। इसके बाद देश के उच्च न्यायालयों एवं प्रेस पर ताला लगा दिया गया। बड़े नेता गिरफ्तार कर लिये गये। मौलिक अधिकार खत्म हो गये और उन्नीस महीने तक एक लाख दस हज़ार आठ सौं लोग गिरफ्तार हुये। आंतरिक सुरक्षा कानून (मीसा) के तहत जेपी, जार्ज फर्नांडीस एवं अटल बिहारी जैसे नेता गिरफ्तार हुये। आज संविधान की रक्षा की बात करने वाले राहुल गांधी को यह इतिहास अवश्य पढ़ना चाहिए। इसके बाद उन्हे समझ आएगा कि संविधान की अवमानना तब ज़्यादा हुयी थी या अब हो रही है।
कुछ महत्वपूर्ण केस हैं मुख्य न्यायाधीश के पास :
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र कुछ महत्वपूर्ण केसों की पीठों में शामिल हैं। इनमे सबसे महत्वपूर्ण हैं राम जन्मभूमि का वाद। इस पर सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने इस पर फैसले को 2019 तक सुरक्षित रखने की मांग की थी। सिब्बल का मानना था कि इस पर निर्णय से 2019 के चुनाव परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। यानि कि कांग्रेस अब न्यायालय को निर्देशित करना चाहती थी कि वह कब अपना निर्णय सुनाये। इसके साथ ही कुछ अन्य महत्वपूर्ण वाद भी दीपक मिश्र के पास हैं। इनमे हैं। आधार एक्ट की वैधता का मामला, रोहिंगया मुसलम्मानों को भारत से बाहर भेजने का मामला, सांसदों के वकालत करने के अधिकार का मुद्दा, भूमि अधिग्रहण में मुआवज़े का मामला, शबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामला, व्याभिचार के लिए पुरुषों पर मुक़दमा चलाने के कानून को चुनौती का मसला, समलैंगिगता और धारा 377 का मामला शामिल है। इसके अतिरिक्त गैरपारसी में शादी का मामला, सेबी और सहारा का मामला, दिल्ली सरकार और एलजी का मामला एवं केरल लव जेहाद का मामला भी मुख्य न्यायाधीश के पास है।
चूंकि यह सभी मामले राजनीतिक असर वाले मामले हैं इसलिए इस पर फैसले राजनीति को भी प्रभावित करेंगे। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र को मोदी सरकार का करीबी माना जाता है और इस तरह से राहुल गांधी ने इस विषय पर राजनीति करते हुये महाभियोग का तानाशाही कदम भी उठा लिया। यदि गहराई से देखा जाये तो वर्तमान में न्यायाधीशों पर सरकार का प्रभाव कम होता जा रहा है। मोदी सरकार द्वारा न्यायिक नियुक्ति कानून पास होने के बाद भी उच्चतम न्यायालय ने उसे खारिज कर दिया था। मोदी सरकार की खूब किरिकिरी हुयी । किन्तु नब्बे के दशक तक ऐसा नहीं था। सरकार का न्यायपालिका पर पूरा दवाब रहता था।
इन्दिरा सरकार का हस्तक्षेप था न्यायपालिका में :
नब्बे के दशक के पहले ज़्यादातर समय कांग्रेसी शासन रहा। 1993 के पहले सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में नियुक्त होने वाले न्यायाधीशों की नियुक्ति सरकार के द्वारा होती थी। वह जिसे चाहती थी, नियुक्त कर देती थी। उस समय कुछ सरकारों ने संविधान की व्याख्या कुछ इस तरह से कर रखी थी कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए मुख्य न्यायाधीश से विचार-विमर्श करना तो आवश्यक है, लेकिन उसकी सलाह से पूरी तरह सहमत होना सरकार के लिए अनिवार्य नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने सरकार का समर्थन 1982 में ‘फर्स्ट जजेज़’ वाले मामले में कर दिया था। मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के संदर्भ में उस समय परंपरा यह थी कि सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को ही देश का मुख्य न्यायाधीश बनाया जाता था।
लेकिन इंदिरा सरकार ने संवैधानिक अधिकारों का दुरुपयोग करते हुये इस परंपरा को अपनी मर्जी से परिवर्तित कर दिया। 1973 में तीन न्यायाधीशों जेएम शेलत, केएस हेगड़े और एएन ग्रोवर की वरिष्ठता को लांघकर जस्टिस एएन रे को मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया। इसके पीछे की वजह थी कि इन न्यायाधीशों ने केशवानंद भारती के मामले में सरकार के खिलाफ फैसला दिया था। इसके बाद जैसे ही जस्टिस रे की नियुक्ति हुई वैसे ही तीनों न्यायाधीशों ने सर्वोच्च न्यायालय से अपना इस्तीफा दे दिया। 1977 में एक बार फिर से वरिष्ठता के आधार पर जस्टिस एचआर खन्ना को नियुक्त करने के बजाय इंदिरा सरकार ने एमएच बेग को मुख्य न्यायाधीश बना दिया। जस्टिस खन्ना ने भी आपातकाल के दौरान एक ऐसा फैसला दिया था जो इन्दिरा सरकार के विरोध में था। जस्टिस खन्ना ने इसके बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद 1993 से न्यायाधीशों की नियुक्ति वाली नयी व्यवस्था “कॉलेजियम सिस्टम” का जन्म हुआ।
कालेजियम व्यवस्था को बदलने पर आंदोलन करे विपक्ष :
राहुल गांधी और विपक्ष अगर न्यायिक व्यवस्था में वास्तविक बदलाव चाहता है तो भारतीय सिविल सेवा की तरह भारतीय न्यायिक सेवा की तरफ क्यों अपना ध्यान नहीं लगाता है। वर्तमान में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठते रहते हैं। अंग्रेजों के समय बने क़ानूनों को हम क्यों नहीं खत्म करते हैं। भारतीयता आधारित संवैधानिक एवं कानून व्यवस्था क्यों नहीं लागू करते हैं। पर ऐसा सरकार में रहते कोई नहीं कर सकता है। न तो राहुल गांधी कर सकते हैं और न उनके पूर्वज कर पाये। यहाँ तक की भाजपा सरकार में मोदी भी नहीं। उसकी वजह है कि 1947 में भारत आज़ाद नहीं हुआ था सिर्फ सत्ता का स्थानांतरण हुआ था। भारत को 99 साल के पट्टे पर अंग्रेज़ भारत को सौंप कर गए थे। भारत में विपक्ष में रहने पर तो सभी दल खूब हो हल्ला करते हैं किन्तु सत्ता में आने पर लाचार हो जाते हैं। भारत के संविधान में एक शब्द ‘डॉमिनियन रिपब्लिक’ है उसका अर्थ है कि आज भी भारत ब्रिटेन का एक उपनिवेश है। व्यवस्था में बदलाव के लिए सम्पूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता है जिसमे सत्तापक्ष और विपक्ष का एक साथ आना पहली शर्त है। पर ऐसा होता हाल फिलहाल तो नहीं दिख रहा है।
(विधि एवं प्रबंधन में परास्नातक लेखक विधि विशेषज्ञ एवं स्तंभकार हैं।)

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