यहां सुहागन तीन माह जीती हैं विधवा की जिंदगी

पति की सलामती के लिए लेती है ऐसा फैसला

आजमगढ़.। यह एक ऐसी परंपरा है जिसपर विश्वास करना मुश्किल है लेकिन वर्षों से ऐसा होता आ रहा है। यहां की महिलाएं सुहागन होने के बाद भी तीन माह तक मांग में सिंदूर नहीं भरती और पति के सलामती के लिए अपने इष्ट की पूजा में जुटी रहती है। तीन माह बाद जब पति वापस लौटता है तो वे फिर सुहागन की तरह जीवन व्यतीत करने लगती है। ऐसा हर साल होता है। महिलाओं को इस टोटके पर पूरा भरोसा है। वहीं परिवार के लोगों को विश्वास है कि ऐसा करने से ही उनके अपने सलामत रहते है।
बात उन परिवारों की हो रही है जो वर्षों से ताड़ के पेड़ से ताड़ी उतारने का काम करते है। गांव में इन्हें गछवाहा के नाम से जाना जाता है। इसमें कुछ स्थानीय सोनकर जाति के लोग है लेकिन गछवाहे का काम ज्यादातर बिहार के दलित जाति के लोग करते है। यह कारोबार अप्रैल माह में शुरू होता है और जून-जुलाई तक चलता है। गछवाहों के आने का सिलसिला शुरू हो गया है।
परंपरा पर ध्यान दे तो गछवाहे जब घर से निकलते हैं, तभी उनकी पत्नियां सिंदूर लगाना छोड़ देती हंै। वे पूरी तरह विधवा की जिंदगी जीती हैं और अपने इष्ट की पूजा अर्चना में लगी रहती हैं। लोगों के अलग-अलग इष्ट होते हैं उसी के हिसाब से पूजा पाठ किया जाता है। वहीं गछवाहे जहां जाते हैं, वहां एक पखवारे तक पेड़ को तैयार करने में लगता है। इस दौरान पेड़ से कच्ची ताड़ी उतारी जाती है। गछवाहे पेड़ से उतरते समय हर दिन टोटके के रूप में ताड़ी जमीन पर गिराकर अपने इष्ट और वहां रहने वाली आत्माओं को समर्पित करते हैं। जब ताड़ी पक कर तैयार हो जाती है तब उसे ग्राहक को परोसा जाता है।
ताड़ी की बिक्री शुरू करने के पूर्व भव्य पूजा की भी परंपरा है। ताड़ी का कारोबार करने वाले ताड़क सोनकर और लालमन सोनकर बताते हैं कि ताड़ी पकने के बाद जब पहले दिन उतारी जाती है तो पेड़ का स्वामी गछवाहे को वस्त्र और उसकी पत्नी के लिए वस्त्र के साथ ही श्रृगार का पूरा सामान देता है। पहली ताड़ी से ही विभिन्न प्रकार के पकवान बनाये जाते है। इस पकवान से इष्ट और पेड़ की पूजा की जाती है फिर प्रसाद का वितरण होता है। इसके बाद ताड़ी की बिक्री शुरू होती है। यह कारोबार बरसात शुरू होने तक चलता है।
बरसात शुरू होने पर गछवाहे पेड़ पर चढना छोड़ देते है और अपने गांव लौट जाते है। जब वे घर लौटते है तो उनकी पत्नी पेड़ के स्वामी द्वारा उपहार स्वरूप दिये गये वस्त्र और श्रृगार के सामन से ही फिर सुहागन का जीवन शुरू करती है। यह परम्परा वर्षों से देखी जा रही है। गछवाहों की महिलाओं का मानना है कि पति परदेश जाता है और वह ऐसा काम करता है कि जिससे उसके जीवन पर हर वक्त खतरा बना रहता है। वह सही सलामत लौट के आये इसलिए वे ऐसा करती हंै।

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