उत्तर प्रदेशः अमीर अंचल – गरीब अंचल/गुंजेश्वरी प्रसाद

अमीरी और गरीबी की परिभाषाएं बदल चुकी हैं और दिन व दिन बदल रही है, लेकिन गरीबी एक ऐसी बीमारी है जो परिभाषाओं के बदल जाने से नहीं बदल रही है। मोबाइल फोन तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में 75 से 80 परिवारों के पास पहुंच चुका है, लेकिन शौचालय की व्यवस्था 10 – 15 प्रतिशत परिवारों में हो पायी है। सुबह शाम भोजन मे अरहर चना या मसूर की दाल नहीं मिल रही है। 10 से 15 प्रतिशत परिवारों में मोटर साइकिल और चैपहिया वाहन देखे जा सकते हैं, लेकिन ऐसे परिवारों के दरवाजों पर गाय-भैस की कमी देखने को मिलती है। टेलीविजन और मोबाइल देखकर अमीरी-गरीबी का पता नहीं लगाया जा सकता है। जो लोग इसे सम्पन्नता मानकर किसी अंचल की आर्थिक विवेचना करते है वे अपने निष्कर्ष से देश और समाज को गलत दिशा देते हैं। ऐसे विश्लेषण पूंजीवाद के एजेण्ट होते हैं। अमीरी-गरीबी का विशेषण स्वास्थ्य और शिक्षा तथा आवास व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में होना चाहिए। जिन लोगों के पास मोबाइल, टेलिविजन और मोटरसाइकिल है उनमें से अधिकांश की ललक बढ़ी है कि जो गैर जरूरती चीजें हैं वे भी जरूरत हो गयी हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से गौर किया जाय तो पूंजीपति वर्ग ने अपने उत्पादों की खपत के लिए पूरे समाज में काम्प्लेक्स पैदा कर दिया है। इस समय हार व्यक्ति काम्प्लेक्स से पीड़ित है। लोगों को पौष्टिक भोजन, आरामदेह भवन, मौसमी वस्त्र और अच्छी पुस्तकों की चिंता नहीं है। अगर चिंता है तो उपभोक्ता मालों खास तौर से ऐसी वस्तुओं का जो भोगवाद को बढ़ावा दे रही है। आर्थिक उदारणीकरण की खूबी यह है कि वह समरूपीकरण का दिखावा करता है। इसके लिए वह हर क्षेत्र में बदलाव कर रहा है। अब हर वर्ग में टेरिकाट का वस्त्र पहुंच चुका है। सूती वस्त्रों की मांग कम हो गयी है। सभी छोटे-बड़े खेतिहर मंसूरी और सरयू-52 की किस्म का धान बो रहे हैं। काला नमक, गौरिया, तुलसी राम, राम भोग जैसे आगहनी धान के बीज लुप्त हो चुके हैं।देशी गेहूँ का बीज 45 वर्षों पूर्व ही लुप्त हो गया। मतलब मजदूर और मालिक दोनों ही वर्ग एक ही तरह का वस्त्र पहन रहे हैं और एक ही प्रकार का अन्न खा रहे हैं।
लेकिन स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में समरूपीकरण नहीं हो पा रहा है और न हो पायेगा। समाजवादी नेता श्री मधुलिमये ने सन् 1982 में भविष्यवाणाी किया था, ‘‘इंदिरा सरकार 8 करोड (उस समय भारत की इतनी ही आबादी थी) में से दस करोड लोगों का भारत बनाना चाहती है और इस तरह का समरूपीकरण करना चाहती हैं। ताकि अमीर और गरीब का भेद दिखायी न दे मगर स्थिति ऐसी होगी कि पूर देश के सभी गांवों और शहरों में आर्थिक असंतुलन बढ़ेगा जिससे हर जगह विभाजन की मांग उठेगी। समरूपीकरण भी एक ही वर्ग का होगा और वह है मध्यम वर्ग। भारत में जितनी जातियाँ है उन सभी जातियों में मध्यम वर्ग के लोग हैं और यही वर्ग यथा स्थितिवाद का प्रवक्ता बनेगा।’’ स्व.लिमये का निधन फरवरी 1995 में हुआ और उन्होंने उस समय जो कहा सब घटित हो रहा है। समरूपीकरण के वकील ही यह कहते हुए मिल जाते हैं कि अब कोई भूख से नहीं मर रहा है। सभी के पैरों में चमड़े का नही ंतो प्लास्टिक का चप्पल है। कोई अधनंगा नहीं दिखायी देता है। सरकार भी अपने प्रचारतंत्रों द्वारा ऐसा प्रचार करती है कि लगता है कि अब कहीं गरीबी नहीं है। भारत सरकार द्वारा जारी प्रतिव्यक्ति औसत राष्ट्रीय आय पर हजार रुपया बताया जाता है। यह पूरे देश की आबादी आ औसत है। इसी आबादी में टाटा, अंबामी, लक्ष्मी मित्तल और बिडला जैसे परिवार भी है। जिनकी दैनिक आय 10 लाख रुपये हैं। भारत के प्रधानमंत्री पर एक दिन में भारत सरकार का 8 लाख रुपया खर्च होता है। बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ छोटे मियाँ सुभान अल्ला। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री पर भी राज्य सरकार का 6 लाख रुपया रोजाना खर्च होता है। इन राजपुरूषों पर हो रहे खर्च को पढ़कर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की वक्तता याद आती है। सन् 1916 में महात्मा गांधी महामना मदन मोहन मालवीय के निमंत्रण पर काशी विश्वविद्यालय के समारोह में गये हुए थे। इस समारोह के मुख्य अतिथि भारत के वाइसराय थे। मुख्य अतिथि के बोलने के बाद महात्मा गांधी ने कहा, ‘‘जिस देश की अधिकांश आबादी को 3 पैसा भी रोज नहीं मिलता है उस देश के वाइसराय पर रोजाना 3 हजार रुपया रोज खर्च होता है। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि समाज में ऐसे लोगों का जीवित रहना बोझ है।’’ उनकी तल्ख टिप्पणी से सभा से ज्यादा लोग चले गये मगर वह अपनी बात पर अड़े हुए थे। डाॅ.मनमोहन सिंह हों या मायावती हों ये लोग जनप्रतिनिधि हैं। और ऐसे जनप्रतिनधियों पर रोजाना लाखों रुपया व्यय हो रहा है। जबकि दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के बुन्दलखण्ड पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में पानी और रोटी के लिए हजारो हजार तड़प रहे हैं। लाखों लाख बीमार होकर अंतिम सांस ले रहे हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के सोनभद्र और मिर्जापुर जिले में पानी का संकट गहरा हुआ है। वहां के लोग पानी के लिए तड़प रहे हैं। गोरखपुर, बलिया, गाजीपुर और वाराणसी के नलों से आर्सेनिक युक्त पानी आ रहा है और ऐसे जहरीले पानी को पीकर लोग बीमार पड़ रहे हैं। यही है आर्थिक उदारीकरण का मानवीय चेहरा।
सरकार में बैठे हुये लोग नौकरशाहों द्वारा तैयार फर्जी (बोगस) आंकड़ों पर नीतियाँ बनाते हैं और विधानसभाओं तथा सार्वजनिक मंचों से वक्तव्य देेते हैं। मानवसंसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी एक समारोह में कौड़ीराम (गोरखपुर) आये हुए थे। उन्होंने भाषण देते हुए कहा ‘‘इस समय देश में 65 प्रतिशत साक्षरता है। केरल में 100 प्रतिशत तमिलनाडु में 92 प्रतिशत महाराष्ट्र में 82 प्रतिशत उत्तर प्रदेश में 55 प्रतिशत पूर्वी उत्तर प्रदेश में 48 प्रतिशत और पूर्वी उत्तर प्रदेश में जनजातियों करउल, मुसहर, जोगी, पवरियां, बसफोड़, पत्थरकरो, और वनधारों में अभी शिक्षा की रोशनी नहीं पहुंची है। मगर सरकार जब औसत निकालती है तो उसके औसत में निरक्षरों का यह वर्ग भी साक्षर मान लिया जाता है। ऐसे ही मानसूनी बरसात का है। केन्द्र की सरकारें और राज्य सरकारें हर वर्ष बरसात का औसत बताती है। इस औसत में राजस्थान का वाडमेर क्षेत्र भी आता है। जहां लोग पपीहा की भांति आकाश की ओर साल भर देखते हैं। सरकारी आंकड़े फर्जी होते हैं। और फर्जी आंकड़ों की रौशनी में जब नीतियाँ बनती हैं तो सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक असंतुलन पैदा होता है। जन असंतोष बढ़ता है।
पी साई नाथ स्वतंत्र पत्रकार हैं और ख्याति प्राप्त हैं। उन्होंने बड़ी मेहनत से पूरे देश की आर्थिक स्थिति का नक्शा तैयार किया है। उन्होंने अपने आर्थिक सर्वेक्षण द्वारा बताया कि भारत की 80 प्रतिशत आबादी 20 रुपया औसत के हिसाब से आय अर्जित करती है। पी साई नाथ का आंकड़ा भी औसत बोलता है। 600 रुपया हर आदमी की मासिक आय नहीं हो सकती है। देश के 18 करोड़ बच्चों और 22 करोड़ वृद्धों की दैनिक अथवा मासिक आय एक नये पैसे की नहीं है। इसलिए आंकड़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
यदि आंकड़ों की भाषा में बात करें तो इस समय सम्पूर्ण राष्ट्रीय आय में प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष 42 हजार रुपया है। उत्तर प्रदेश की वार्षिक आय में प्रति व्यक्ति की आय 28000 रुपया है। इसमें पश्चिम उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति की औसत वार्षिक आय 33 हजार रुपया पूर्वी उत्तर प्रदेश में 30 हजार और बुन्देलखण्ड में 25 हजार रुपया प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश जिसे चैधरी अजीत सिंह हरित प्रदेश कहते हैं सिर्फ आंकड़ों में ही नहीं प्रति एकड़ उपज, उद्योग, कारखाना, शिक्षा स्वास्थ्य के क्षेत्र में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बुदेलखण्ड से आगे है। इस क्षेत्र में आबादी का औसत धनत्व 689 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर है। जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश् में आबादी का औसत धनत्व 711 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीट है। बुन्देलखण्ड में आबादी का औसत धनत्व 5 वर्ग किलोटर है। कम आबादी होने के बावजूद बुन्देलखण्ड में गरीबी पल्थी मार कर बैठी हुई है।
चैधरी अजित सिंह जिस हरित प्रदेश की आवाज उठाया करते हैं वह अंचल पूर्वी उत्तर प्रदेश और बुन्देलखण्ड से काफी सम्पन्न है। इसके बावजूद वह उत्तर प्रदेश में हरित प्रदेश की मांग क्यों करते हैं और दूसरी ओर बुन्देलखण्ड जो उत्तर प्रदेश का सर्वाधिक पिछड़ा क्षेत्र है उत्तर प्रदेश से अलग होने की मांग नहीं करता है यह एक पक्ष प्रश्न है। इस प्रश्न का उत्तर सभी के पास है लेकिन उसकी कोई वैज्ञानिक आवाज नहीं है। समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र का सिद्वान्त है कि घर परिवार हो समाज हो या राज्य कोई भी आपने साथ कमजोर या निर्बल को नहीं रखना चाहता है। परिवार में जो ताकतवर होता है वह कमजोर को अपने से अलग कर देता है। चैधरी अजित सिंह हो या उनके पिता स्व. चैधरी चरण सिंह रहे हों दोनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य के रुप में देखने के पक्षधर थे और हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश एक गरीब अंचल है और इस अंचल के बड़े नेताओं जैसे राजनारायण, उग्रसेन, गेंदा सिंह, माधव प्रसाद त्रिपाठी, रामसुन्दर पाण्डेय, चन्द्रशेखर, रामनरेश इत्यादि ने कभी भी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य के रुप में देखने की मांग नहीं किया है इन लोेकप्रिय नेताओं ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के आर्थिक पिछड़ापन को दूर करने के संदर्भ में विशेष आर्थिक पैकेज की मांग की थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नेता पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ रहने के पक्षधर नहीं थे। इस संदर्भ में चैधरी चरण सिंह का यह कथन याद करने योग्य है ‘‘पूर्वी उत्तर प्रदेश पिछड़ा हुआ नहीं है इस क्षेत्र में बाहर और दूसरे देशों से ज्यादा मनीआर्डर आता है यहां लोग आलसी हैं हल की मूठ थामना पाप समझते है।’’ चैधरी चरण सिंह भी बहुत अकड़े बाज थे। लेकिन आंकड़ों में संवेदनशीलता नहीं होती है। अंकड़े दर्द को भोथरा बना देते हैं यह आंकड़ों का ही कमाल है। इस समय पूरर्वी उत्तर प्रदेश के गुट भैया चैधरी अजीत सिंह के स्वर में स्वर मिलाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश से अलग करने की आवाज उठाने लगे हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के ऐसे लोगों की आवाज से चैधरी अजीत सिंह को बल मिल रहा है। और पूर्वी उत्तर प्रदेश का घटा हो रहा है। घाटा इस अर्थ में किसी भी क्षेत्र में आर्थिक विकास के दो कारक आर्थिक कारण और गैर आर्थिक कारक होते हैं। आर्थिक कारक में भौगोलिक (प्रकृतिक रचना) और गैर आर्थिक कारक में सामाजिक, राजनैति और आर्थिक कारक होते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश दोनों कारक प्राकृतिक, आर्थिक और गैर आर्थिक (सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक) लगभग संतुलन स्थापित करते हैं। वहां का समाज सामंती नहीं हैं। वहां कृषि योग्य भूमि समतल है और यातायात तथा विद्युत व्यवस्था ठीक है। ज्यादा से ज्यादा लोग स्वालंबी है। छोटे बड़े उद्योग इस अंचल में सेवारत हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के आर्थिक विकास में सबसे बड़ी बाधा प्रकृतिक कारक से है। हिमालय से निकलने वाली सभी बड़ी नदियां इस अंचल की छाती को चीर कर बहती हैं। पूरा इलाका खाल और ताक का है। 40 प्रतिशत भूमि डूप क्षेत्र में आती है। अभी भी इस अंचल का समाज सामंती स्वभाव का है। राजनैतिक दलों का आधार जातिवाद है और विकास की जो योजनाएं बनाई जाती हैं। उनमें स्थानीय जनता का सहयोग नहीं लिया जाता है। नौकरशाहों द्वारा तैया योजनायें चलाई जाती है जिसमें भ्रष्टाचार करने की गुंजाइश होती है।
ऐसी स्थिति में जो लोग उत्तर प्रदेश से पूर्वी उत्तर प्रदेश को अलग करने की मांग करते हैं, उसमें बुद्धिमानी नहीं है। संप्रभु राज्य बनाने में जिन मूलभूत चीजों की आवश्यकता होती है। उनका पूरा अभाव है। खनिज सम्पदा में इस अंचल में सोनभद्र और मिर्जापुर के पहाड़ हैं। उद्योग के नाम पर भदोही का कालीन उद्योग है। मऊ, टाण्डा और मगहर का हथकरघा उद्योग मर चुका है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की चीनी मिलें पुरानी हो चुकी हैं। अधिकांश बन्द हैं। नदियाँ प्रदूषित हैं। ले-देकर विन्ध्यवासिनी देवी बनारस का विश्वनाथ मंदिर है जो तीर्थ केन्द्र है, जो पर्यटन स्थल है। इस अर्थ में कुशीनगर और कपिलवस्तु भी बौद्धतीर्थ यात्रियों का पर्यटन स्थल है। जहाँ तक समाज रचना का सवाल है अब भी सामंती बना हुआ है। राजनैतिक दलों का आधार जातिवाद और क्षेत्रीयतावादी है। ये सब ऐसी स्थितियाँ हैं जो एक संप्रभुराज्य बनने को इजाजत नहीं देती हैं। और पिछड़ापन को बढ़ावा देती है।
भारत के आर्थिक मानचित्र में उत्तर प्रदेश पिछड़ा हुआ गरीब अंचल है और उत्तर प्रदेश में पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बुन्देलखण्ड गरीब अंचल हैं। जिन्हें अभिशप्त कहना उचित होेगा।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के भोजन में पौष्टिकता है। इसलिए उनका स्वास्थ्य और उनकी उम्र लम्बी है, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों के भोजन में कैलोरी का मात्रा कम है। अतएव यहाँ के लोगों की औसत उम्र कम है। मोबाइल की संख्या बढी है। दूरदर्शन और मोटर साइकिलों की संख्या पूर्वी उत्तर प्रदेश में बढ़ी लेकिन भोजन में प्रोटिन (दाल और दूध) की मात्रा घटी है। यही कारण है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में जो लोग पेंशनर है और सुविधा संयन्त्र खाते पीते घरों में हैं। उनकी औसत आय 70-72 की हो चुकी है। मगर खेती में लगे हुए लोगों की कार्य क्षमता औसत उम्र में गिरावट दर्ज हो रही है।
जो लोग विभाजन की बात करते हैं उनके सामने पूर्वी उत्तर प्रदेश नहीं होता है। उनके स्वर में गंभीरता नहीं होती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के विकास के लिए केन्द्र और राज्य से विशेष आर्थिक पैकेज की आवश्यकता है। इस विशेष आर्थिक पैकेज के लिए चैधरी अजित सिंह और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों के सहयोग की जरूरत है। जरूरत है रामकृष्ण को अलग-अलग न करके एक जगह बांध कर रखने की। जन सामान्य इन दोनों को अलग नहीं करना चाहता है। यदि गरीबी के खिलाफ लड़ना है तो विशेष आर्थिक पैकेज के प्रश्न पर सबको एक मंच पर आना चाहिए।

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