क्यों होता है महिलाओं से छेड़छाड़/ -डाॅ. प्रेमपाल सिंह वाल्यान

स्त्रियों से छेड़छाड़ की घटनाएँ प्राचीन काल से ही घटती रही हैं। लेकिन वर्तमान समय में इनकी बारम्बारता तो बढ़ ही गई है साथ ही इन घटनाओं ने काफी विभित्स रूप ले लिया है।
यह प्रकृति का नियम है कि विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होता ही है, परन्तु युवक-युवतियां यदि स्वस्थ मानसिक धरातल पर मित्रता करते हैं तो वह निश्चित रूप से स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकते हैं। यदि उनकी छेड़छाड़ से छिछोरापन प्रदर्शित होता है या किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचती है या किसी की अस्मिता पर आँच आती है तो निश्चित ही यह दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन देखने में आता है कि स्कूल व काॅलिज जाती युवतियों तथा कामकाजी स्त्रियों को अक्सर भौंड़ी छेड़छाड़ का सामना करना पड़ता है। महिलाएँ छेड़छाड़ का शिकार क्यों बनती हैं तथा वे किस प्रकार इस स्थिति से अपने को उबार पाती हैं यहाँ प्रस्तुत हैं उनके महत्वपूर्ण विचार –
कु0 ऋतुसिंह:- हापुड़ की जानी-मानी चित्रकार कुमारी ऋतु सिंह का कहना है कि, अधिकांश लड़कों की यह प्रवृति होती है कि वे मौका मिलते ही लड़की को छेड़ने लगते हैं। कई बार इसके कुछ कारण भी होते हैं। जैसे यदि कोई लड़की फैशन परस्त हो, वह अपने आपको प्रदशर््िात कर रही हो, अजीब ढंग से बोल रही हो या वह लड़कों को देखकर हंसती हो तो उसके छेड़छाड़ का शिकार बनने की संभावना अधिक होती है। छेड़छाड़ से बचने के लिए युवतियों को अपनी भाषा तथा भेष-भूषा पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अगर संयमित व्यवहार के उपरांत भी कोई युवक उसे छेड़ता है तो उसकी शिकायत पुलिस से या अपने अभिभावकों से तुरंत करें। जिससे उसका हौंसला न बढ़ें और खुद को किसी अनहोनी से बचाया जा सके।
श्रीमती कमलेश सिंह:-बुलन्दशहर निवासी कुशल ग्रहणी श्रीमती कमलेश सिंह का कहना है कि, ‘‘अविवाहित युवक ही नहीं बल्कि विवाहित पुरूष भी युवतियों को छेड़ने में पीछे नहीं हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि पुरूष वर्ग केवल महिलाओं की फैशन परस्ती को देखकर ही छेडे़ं। इसका कोई भी कारण हो सकता है।
जहाँ तक छेड़ने के तरीके का सवाल है तो वे अक्सर सीटी बजाने लगते हैं या फिर अश्लील गाना गाने लगते हैं या उसके पहनावे पर कमेंट कसते हैं। छेड़छाड़ को बढ़ावा मिलने का मुख्य कारण लड़कियों के अन्दर बैठे पारिवारिक संस्कार भी होते हैं। उन्हें बचपन से ही यह सिखा दिया जाता है कि, ‘‘ऊँचा मत बोलो, जोर से मत हँसों। लड़ाई झगड़ों से बचकर रहो तथा अपनी मर्यादा में रहो।
जहाँ तक छेड़छाड़ से बचाव का सवाल है तो यह जानना जरूरी है कि लड़कियों के प्रति लड़कों का व्यवहार यौन आकर्षण से निर्धारित होता है। इसलिए युवाओं को यौन शिक्षा आवश्यक है। साथ ही युवतियों को अपना आत्मबल बनाये रखना चाहिए। उन्हें अपनी रक्षा हेतु जूड़ो कराटे का प्रशिक्षण लेना चाहिए तथा साहस और बुद्धि का प्रयोग कर अपनी रक्षा करनी चाहिए।
सुश्री आसमा खातून:- पब्लिक स्कूल की प्रधानाचार्या सुश्री आसमा खातून का कहना है कि, ‘‘छेड़छाड़ की घटनाओं में हुई वृद्धि के मुख्य कारण छेड़छाड़ के प्रति भारतीय पुलिस कर्मियों की उदासीनता तथा चलचित्र व धारावाहिक हैं। हमारा समाज भी उचित प्रतिक्रिया नहीं कर पाता है। छेड़छाड़ के ढंग भी कई प्रकार के हैं जैसे – राह चलती युवतियों का पीछा करना, उन पर टाॅन्ट कसना, जबर्दस्ती बात करने की कोशिश करना, अश्लील हरकतें करना, भीड़ का सहारा लेकर छूने की कोशिश करना आदि।
जहाँ तक छेड़छाड़ से बचने का सवाल है तो तुरन्त तीखी और उग्र प्रतिक्रिया देना, छेड़छाड़ करने वाले के उत्साह को कम करता है। कई बार तंग करने वाले बहस करके मजे लेने की कोशिश करते हैं। आप उन्हें समय देंगी तो उन्हें बढ़ावा मिलेगा। अपनी बात कहें और आगे बढ़ जाएं। डरें नहीं सीधे उनकी आँखों में देखकर अपनी बात कहें। ढीली-ढाली होकर न चलें। पूरे आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ायें। छेड़छाड़ करने वालों और उनकी इस बीमार सोच का डटकर मुकाबला करें।
डाॅ. मंजू ‘नरेश:- डाॅ. मंजू जो कि एम.ए., एम.एड. हैं तथा हिन्दी में पीएच.डी. हैं और इंटर काॅलिज बकेवर में हिन्दी की प्रवक्ता हैं, इनका कहना है कि, ‘‘ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण के लिए एक-दूसरे के पूरक दो रूपों की रचना की थी जिन्हें पुरूष और नारी कहा जाता है। जहाँ पुरूष कठोरता, सक्रियता, शक्ति एवं शौर्य का परिचायक है वहीं नारी करूणा, क्षमा, समर्पण की मूर्त रूप है।
नारी के इन्हीं दैवीय गुणों को पुरूष समाज उसकी कमजोरी समझता है। यही कारण है कि उसके साथ आये दिन छेड़छाड़, बलात्कार जैसी घटनाएं होती रहती हैं।
‘छेड़छाड़’ शब्द का अंग्रेजी पर्याय म्अम ज्मंेपदह है। नारीवादी लेखकों ने इसे ‘छोटे बलात्कार’ का नाम दिया है। छेड़छाड़ एक ऐसा अपराध है जिसे प्रमाणित करना बेहद मुश्किल है क्योंकि इस अपराध में महिलाओं के साथ सरल तरीके अपनाये जाते हैं। जहाँ तक इसके कारणों का सवाल है तो भले ही हमारे देश में आधुनिकता का विस्तार हुआ है परन्तु हमारे आधुनिक समाज का दृष्टिकोण भी औरत के प्रति रूढ़िवादी है। उनकी सोच है कि महिलाओं को नैतिकता की परिधि से बाहर नहीं आना चाहिए। इसी मानसिकता के कारण वे छेड़खानी का शिकार होती हैं, साथ ही बचपन से उन्हें डरा कर रखना, उन्हें उनकी आत्मशक्ति से परिचय न कराना, अश्लील फिल्में व अश्लील गाने भी छेड़खानी के मुख्य कारणों में हैं।
जहाँ तक छेड़छाड़ के निवारण का सवाल है तो इसके विभिन्न उपाय करने चाहिए। सर्वप्रथम महिलाओं को आत्मरक्षा की तकनीक सिखानी होगी। उन्हें अन्जान पुरूष के साथ अकेले नहीं जाना चाहिए, किसी को भी निजी विवरण नहीं देना चाहिए, घर से बाहर निकलते समय हमेशा अपने साथ मिर्च स्प्रे करने का यंत्र रखना चाहिए। जहाँ किसी भी तरह की गड़बड़ी की आशंका हो तो शीघ्र ही इमरजेंसी नंबर या किसी परिजन को वाहट्स-अप करना चाहिए। विभिन्न शहरों में हेल्पलाइन नंबर बड़े-बड़े अंकों में अस्पतालों, कालेजों, स्कूलों के परिसरों में अंकित होना चाहिए। तमिलनाडू की तरह अन्य राज्यों में भी छेड़खानी को गैर जमानती अपराध घोषित कर देना चाहिए। अश्लील फिल्मों, गानों व अश्लील पोस्टर लगाने पर बैन लगना चाहिए। सार्वजनिक स्थलों पर महिला पुलिस को सादे वेश में नियुक्त करना चाहिए। महिलाओं को ऐसे अपराध के निवारण हेतु बनाये गये कानूनों की जानकारी होनी चाहिए। जैसे- भारतीय दंड संहिता की धारा 354-ए, धारा 354-डी में महिला के प्रति अश्लील इशारों, अश्लील टिप्पणियों, पीछा करने पर कठोर कारावास या जुर्माना दोनों का प्रावधान है।
इन उपायों द्वारा हम महिलाओं के साथ हो रहे छेड़खानी के अपराध को खत्म कर सकते हैं और उनके अस्तित्व की रक्षा कर सकते हैं क्योंकि जिस देश में महिलाओं का सम्मान नहीं होता वह देश निश्चित ही विनाश के गर्त में लीन हो जाता है।
श्रीमती मीरा अग्रवाल:-राजकीय कन्या इंटर काॅलेज इटावा की भू.पू. प्रवक्ता मीरा अग्रवाल का कहना है कि, ‘‘जब भी मैं सुबह उठकर समाचार पत्रों से या टीवी पर नन्हीं अबोध बच्चियों और महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़, अश्लील हरकतों व बलात्कार की घटनाओं की जानकारी पाती हूँ तो मन दुखी और विचलित हो उठता है। सोचने को विवश हो उठती हूँ कि, ‘‘हम क्या थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी?’ और हमारी इस युवा पीढ़ी को क्याहो गया है? इस पीढ़ी पर टीवी पर प्रसारित होने वाले ऊलजलूल सीरियल्स और फिल्मों का प्रभाव हावी है और यह प्रभाव हमारी इस पीढ़ी को हमारी संस्कृति, सदाचार, मर्यादा व तहजीब से बहुत दूर ले जा रहा है। हम भ्रूण में ही बेटियों की हत्या कर रहे हैं इससे लिंगानुपात बिगड़ रहा है, यह भी दुष्कर्म का एक कारण है। जहाँ तक निवारण का सवाल है तो हमें अपनी सोच को बदलने की जरूरत है। हम अपनी बेटियों को यह समझाते हैं कि तुम कोई गलत कदम न उठा लेना वरना हमारे परिवार की इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। मैं यह जानना चाहती हूँ कि हम अपने बेटों को यह क्यों नहीं समझाना चाहते कि तुम भी किसी परिवार की बेटी की इज्जत से मत खेलना वरना तुम्हारी बहनें कैसे सुरक्षित रह सकेंगी और यदि तुमने ऐसा किया तो हम तुमसे अपना नाता तोड़ लेंगे लेकिन देखने में तो यह आता है कि बहुत सी माँ तो अपने बेटे की गलती सामने आने पर रक्षा-कवच बनकर खड़ी हो जाती हैं। इससे लड़कों में अपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। लेकिन इसके साथ ही हमें अपनी बेटियों को भी यह बताना होगा कि आधुनिकता की अन्धी दौड़ में उन्हें अपने पहनावे और व्यवहार में मर्यादा और शालीनता को बनाए रखना है। हमें अपनी बेटियों को आत्मरक्षा के साधनों को अपनाने के लिए प्रेरित करना होगा, उनकी स्वछंदता और श्रृंखलता पर रोक लगानी होगी। हमारा तो विचार है कि लड़का व लड़की में अन्तर न कर दोनों को ही सामान्य जीवन में मर्यादित व्यवहार करने के लिए प्रेरित करना शायद इस समस्या के निराकरण में सहायक होगा।

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