गुंजेश्वरी प्रसादः जिसने अन्तिम सांस भी समाजवादी चोले में ली……. 


-अरविन्द कुमार सिंह
वह सन् 2008 का फरवरी या मार्च का महीना रहा होगा, जब पहली बार मैं और आजमगढ़ के धूर समाजवादी श्री विनोद कुमार एक साथ कौड़ीराम जा रहे थें। दो पहिया से 70 किलोमीटर का सफ़र कब बीत गया, पता ही नहीं चला। समाजवाद और समाजवादी आंदोलनों के अतीत और वर्तमान पर बात करते विनोद भईया, गुंजेश्वरी प्रसाद की चर्चा करना कभी नहीं भूलते।

 उस दिन भी हमारी चर्चा के केन्द्र में गुंजेश्वरी प्रसाद और उनके समाजवादी आंदोलनों की धार ही था और अगले कुछ समय बाद हम कौड़ीराम से सटे जिस गांव में पहुंचे थे, वह गांव मिश्रौली था। बाजार से सटे उस पगडंडी ने, जो अब खडन्जा में तब्दील हो रही थी, गांव के बाए किनारे से होते हुए एक घर के सामने पहुंचा दी। सामने बदन में आधे बांह की कमीज और कमर में गमछा लपेटा, सत्तर वर्षीय दुबला-पतला एक शख्स खड़ा होकर हमारा अभिवादन कर रहा था, देखने में तो वह मुद्राराक्षस का प्रतिरूप लग रहा था, लेकिन यह हमारा भ्रम था। दरअसल वे समाजवाद के पुरोधा गुंजेश्वरी प्रसाद थें।
मैं पहली बार उनका साक्षात दर्शन कर था, या यूं कहें तो मेरा साक्षात् ?समाजवाद? से साक्षात्कार हो रहा था। विनोद भईया के इस उपकार को मैं इस जन्म में कभी नहीं चुका सकता। कारण, उन्होंने जिस महामानव का दर्शन कराया, उसने मेरे जीवन की धारा और सोच ही बदल दी। दरअसल गुंजेश्वरी प्रसाद को समझना समाजवाद के व्यावहारिक और सैद्धान्तिक शास्त्र को समझ लेना हैं। विचारों की दीवानगी और सोच को, हथियार बनाकर आन्दोलन की जमीन तैयार करने की दीक्षा पा लेना है। जिसके मूल में समाज के आखिरी पंक्ति का, आखिरी आदमी के जीवन स्तर में सुधार और परिवर्तन लाना है। गुंजेश्वरी प्रसाद खांटी समाजवादी नेता हैं, लेखक हैं, या पत्रकार ? यह समझ पाना मेरे लिए काफी दिनों तक असहज था। लेकिन जब समझा तो पाया कि वे अपने आप में पूरी क्रांति थें। एक पूरी वैचारिक संस्था; जिसकी सोच की आधारभूमि समाजवादी आचार्य डाॅ.राममनोहर लोहिया से अभिसिंचित हैं तो कर्मभूमि, जेपी और राजनारायण के तेज से दीक्षित है।
यह, वही समय है जब आजमगढ़ से एक पत्रिका के रूप में ?शार्प रिपोर्टर? का प्रसूत हो रहा था। मार्च-2008 में इसके पहले अंक में गुंजेश्वरी प्रसाद के आलेख और उनके संरक्षण में इस वैचारिक अभियान का आगाज़ हुआ। फिर तो गुंजेश्वरी प्रसाद और मिश्रौली मेरे लिए एक तीर्थस्थल सा बन गया। जहां मुझे हर महीने या दो महीने में जाना ही होता था। मिश्रौली मेरे लिए अब अनजाना नहीं था और नहीं उनका घर ही मेरे लिए पराया। घर पहुंचते ही गुंजेश्वरी प्रसाद और उनकी बूढ़ी पत्नी जो पीठ से कूबड़ हैं, खिलाने-पिलाने के लिए परेशान हो जातीं। माता जी भी पैसठ-सत्तर की थीं, लेकिन अल्जाइमर से पीडित थीं। घर में इनके अतिरिक्त तीसरा कोई नहीं था। बूढ़ापे की यही एक त्रासदी थी जो गुंजेश्वरी प्रसाद को अन्दर तक आहत कर देती थी। चार-चार बेटांे, बहुओं और पोतों के बावजूद यह दम्पत्ति घर में अकेले थी। बच्चें बाहर नौकरी करते और अपना परिवार पालते, नहीं पलता तो जन्म देने वाले मां-बाप का पेट जो लगभग आज के समाज की सच्चाई है। इस सच्चाई को गुंजेश्वरी प्रसाद ने भी भारी मन से स्वीकार कर लिया था। लेकिन बूढे़ मां-बाप की आंखों में यह दर्द कभी भी पढ़ा जा सकता था। देश का इतना बडा समाजवादी विचारक, पत्रकार निजी जिन्दगी में भीड के बीच किस कदर अकेला था, यह सहज ही समझा जा सकता था। दोनों एक दूसरे के बूढ़ापे की लाठी थें। एक कमजोर पडता तो दूसरा संभालता, लेकिन टूटता कोई नहीं। कारण, गुंजेश्वरी प्रसाद जिस समाजवाद के आचार्य से दीक्षित थें, वह जीवन में कभी हार नहीं माना। जिसे यह विश्वास था कि ?लोग मेरी बात मानेंगे जरूर, लेकिन मेरे मरने के बाद।? यह सिलसिला चलता ही गया और देखते ही देखते एक दशक बीत गया। इस दरम्यान गुंजेश्वरी प्रसाद की शरीर रूग्ण होती गयी लेकिन उनका विश्वास व समाजवादी चिन्तन और पुष्ट होता गया। वे 80 साल की अवस्था में भी सडी गली व्यवस्था से दो दो हाथ करने को मचल उठते। वे सबसे अधिक समाजवाद के नाम पर अपनी दुकानदारी चलाने वाले नव समाजवादियों से व्यथित थें। पिछली बार उनसे मिलने के लिए हम तीन लोग मिश्रौली गये थे। जार्ज फर्नांण्डीज के अभिन्न सहयोगी एवं समाजवादी चिंतक विजयनारायण, वाराणसी से वरिष्ठ पत्रकार योगेन्द्र नारायण शर्मा और आजमगढ़ से मैं। जीवन से निराश वे तब नहीं थें हां व्यवस्था से निराश जरूर दिख रहे थे। लेकिन अपने पुराने मित्रों से मिलकर खुश भी थे।
       अचानक से 26 जून-2016 के शाम को मेरी मोबाइल पर घंटी बजती है, उठाया तो महेन्द्र सिंह की भर्राई आवाज सुनाई पडती है…??सर ! गुरू जी नहीं रहें??। ये शब्द मेरे कानों से होते हुये मेरे समूचे अस्तीत्व को संज्ञाशून्य कर देता है। अभी 3-4 दिन पहले ही तो मेरी बात हुई थी और वे तब एक आलेख तैयार कर रहे थें। बोल रहे थें अबकी बार मुलायम के नवसमाजवाद पर विस्तृत लेख भेज रहा हंू। मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि बाबू जी, इतनी जल्दी हमे छोड कर चले जायेंगे। लेकिन यही तो नियति का खेल है। जो सबका लेखा जोखा रखता है उसका कौन रख सकता है।
     गुंजेश्वरी प्रसाद देश के न केवल दूरदर्शी पत्रकार थे बल्कि मेरे लिए गुरू व अभिभावक भी थे। पत्रकारिता के जिन उच्च मानदण्डों की गुंजेश्वरी प्रसाद ने स्थापना की आने वाली पीढ़ियाँ शायद उन्हें छू भी न पायंे। उनकी कथनी और करनी की साम्यता के कारण ही जयप्रकाश नारायण स्वयं उनसे मिलने गोरखपुर आये थे। गुंजेश्वरी प्रसाद ने समाजवाद की दीक्षा स्वयं इसके आचार्य डाॅ.राममनोहर लोहिया से ली थी। गोरखपुर के जिला परिषद के सभागार में पहली बार गुंजेश्वरी प्रसाद की मुलाकात राममनोहर लोहिया से हुयी। जहाँ पर डाॅ.लोहिया ने गुंजेश्वरी प्रसाद से सवाल किया कि देश के लिए तुम क्या दे सकते हो ? जिस पर गुंजेश्वरी प्रसाद ने कहा था कि डाॅ. साहब ! मेरे पास न धन है और न दौलत, ले देकर यही शरीर है जिसे मैं आप को दे सकता हूँ। उनके इस जवाब से प्रभावित होकर डाॅ.राममनोहर लोहिया ने स्वयं उन्हें चार आने की सदस्यता देकर पूर्णकालिक समाजवादी बना दिया। जिसके फलस्वरूप गुंजेश्वरी प्रसाद पाण्डेय, गुंजेश्वरी प्रसाद हो गये। धर्म, जाति, सम्प्रदाय से ऊपर उठकर गुंजेश्वरी प्रसाद ने समाजवादी आंदोलन को मुखर किया और बदले में 24 बार जेल यात्राएं कीं। दमनकारी शासन एवं पुलिस की बर्बरता के शिकार गुंजेश्वरी प्रसाद के सभी दांत तोड़ दिये गये थें, बावजूद समाजवादी आंदोलन की धार जीवन पर्यन्त कमजोर नहीं होने दी। और लोहिया से किये गये वायदे के मुताबिक अंतिम सांस भी समाजवादी विचारधारा के चोले में ही ली। आजादी के समय देश बंटवारे के बाद गांधीवादी नेता खान अब्दुल गफ़्फार खां अर्थात् सीमांत गांधी, महात्मा गांधी के कहने पर पाकिस्तान चले गये। और वे जब पहली बार हिन्दुस्तानी धरती पर अपने पांव रखे तो वह गुंजेश्वरी प्रसाद ही थे, जिन्होंने उनका विस्तृत साक्षात्कार लिया। यह ऐतिहासिक साक्षात्कार तत्कालीन समय में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ था। गुंजेश्वरी प्रसाद के आलेख जो पूर्वी उ.प्र. के सामाजिक जीवन दर्शन पर हैं, उसे आस्ट्रेलिया के कैनबरा विश्वविद्यालय में आज भी पढ़ाया जाता है। सोवियत संघ की पत्रिका सोवियत भूमि से लेकर लोहिया के चैखम्भा, हैदराबाद की कल्पना, धर्मयुग, दिनमान, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, रविवार जैसी पत्रिकाओं में राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक विषयों पर उनके विचारोत्तेजक आलेख पिछले चार-पांच दशकांे तक भारतीय पाठकों का मानसिक खुराक था। दिल्ली में रह कर उन्होंने ?एशियन डान? पत्रिका का संपादन भी किया। लिखने पढ़ने का यह क्रम अंतिम सांस तक चलता रहा। मरने से पूर्व भी उन्होंने अंतिम आलेख  समाजवादी मुलायम और उनके नवसमाजवाद पर लिख रहे थे। गुंजेश्वरी प्रसाद की लेखन शैली राष्ट्रीय मुद्दों को ही नहीं जब अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों को उठाती तो उनमें एक दूरदर्शी लेखक एवं अन्तर्राष्ट्रीय विषयों की विशेषज्ञयता झलकती थी। उनकी लेखनी समाज के हर वर्ग के लिए चली।
13 मार्च-1936 को गोरखपुर जनपद के कौड़ीराम बाजार से सटे मिश्रौली गांव में पैदा हुए गुंजेश्वरी प्रसाद 1957 में स्नातक किये। लोहिया के जनआंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाते हुए अंगे्रजी हटाओं आंदोलन 1960, दामबांधों आंदोलन 1960, बीमार प्रधानमंत्री हटाओं 1964, उ.प्र. बन्द आंदोलन 1966, भूमि बांटों 1969, इंदिरा हटाओं 1970 तथा आपातकालीन आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी। 1964 में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को काला झण्डा दिखाकर चर्चा में आये स्व.गुंजेश्वरी प्रसाद ने माया त्यागी काण्ड को जनआंदोलन बना दिया था। समाजवाद के आचार्य डाॅ.राममनोहर लोहिया पर गुंजेश्वरी प्रसाद ने एक किताब ?डाॅ.राममनोहर लोहिया? लिखी है जिसे नेशनल बुक ट्रस्ट नई दिल्ली ने छापा है। पत्रकारिता में दीर्घकालिक सेवा के लिए अनेक पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मानित गुंजेश्वरी प्रसाद को 1965 में सह अस्तित्व पर सोवियत भूमि पुरस्कार, रामधारी सिंह दिनकर पुरस्कार, पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर के हाथों सरयूरत्न सम्मान आदि प्राप्त हुये। अभी पिछले 29 मार्च को आजमगढ़ में आयोजित ?मीडिया-समग्र मंथन 2016? के दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यक्रम में उ.प्र. के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष मा. सुखदेव राजभर के हाथों उन्हें ?शार्प रिपोर्टर लाइफ टाइम अचीवमेंट सम्मान 2016? प्रदान किया गया था।
मेरे जैसे नवांकुर पत्रकारों के लिए गुंजेश्वरी प्रसाद एक पूरी पाठशाला थें। ऐसी पाठशाला जो अनुभव से पकी थी, सिद्धान्तों से कसी थी और विचारों से लैस थी। वर्तमान में रह कर जो दूर भविष्य को देख सकता था। जिसने समाज के हर वर्ग के दर्द को महसूस किया और उसे अपनी लेखनी से स्वर दिया हो। उनका महाप्रयाण, यानि हमारे सिर से उनके हाथों का उठ जाना, हमे अनाथ कर गया। जिस 25-26 जून को इस देश में आपातकाल थोपा गया उसके ठीक 41 साल बाद 80 वर्षीय इस महामानव ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया…।
लेखक शार्प रिपोर्टर पत्रिका के संपादक हैं मों-09451827982

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