पर्यावरण संरक्षण में महिलाओं की भूमिका/मंजु त्यागी

पर्यावरण शब्द का अर्थ है हमारे चारों ओर का आवरण। पर्यावरण संरक्षण का तात्पर्य है कि हम अपने चारों ओर के आवरण को संरक्षित करें तथा उसे अपने अनुकूल बनाए रखें। इस प्रकार पर्यावरण का सीधा सम्बन्ध प्रकृति से है। सभी तरह-तरह के जीव-जन्तु, पेड़-पौधे तथा अन्य सजीव-निर्जीव वस्तुएँ मिलकर पर्यावरण की रचना करते हैं। वायु, जल तथा भूमि निर्जीव घटकों में आते हैं जबकि जन्तु-जगत तथा पादप-जगत से मिलकर सजीवों का निर्माण होता है। पर्यावरण और प्राणी एक-दूसरे पर आश्रित हैं। जीव-जगत में मानव सबसे अधिक संवेदनशील प्राणी है। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वह अन्य जीव-जन्तुओं, पादप, वायु, जल तथा भूमि पर निर्भर रहता है। प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए पर्यावरण और जीवित चीजो के बीच नियमित रूप से विभिन्न चक्र घटित होते रहते है। यदि किसी भी कारण से यह चक्र बिगड़ जाता है तो प्रकृति का भी संतुलन बिगड़ जाता है। हमारा पर्यावरण हजारो वर्षों से हमें और अन्य प्रकार के जीवो को धरती पर बढ़ने, विकसित होने और पनपने में मदद कर रहा है। जबकि अब भौतिकवादी युग में परिस्थितियाँ भिन्न होती जा रही हैं। मानव के परिवेश में पाए जाने वाले जीव-जन्तु पादप, वायु, जल तथा भूमि निरंतर प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं। एक ओर विज्ञान एवं तकनीकी के विभिन्न क्षेत्रों में नए-नए आविष्कार हो रहे हैं तो दूसरी ओर मानव जीवन भी कुप्रभावित हो रहा है। हानिकारक रसायनों के उपयोग द्वारा कृत्रिम रूप से तैयार उर्वरक मिट्टी को खराब कर रहे हैं। परोक्ष रूप से हमारे दैनिक खान-पान से हमारे शरीर में एकत्र हो रहे हैं। औद्योगिक कंपनियों से उत्पन्न हानिकारक धुँआ दैनिक आधार पर प्राकृतिक हवा को प्रदूषित कर रहे हैं जबकि कैमिकलयुक्त पानी भूगर्भ में जाकर हमारे पीने योग्य पानी को खराब कर चुका है।
भारतीय संस्कृति में पर्यावरण के संरक्षण को बहुत महत्व दिया गया है। यहाँ मानव जीवन को हमेशा मूर्त या अमूर्त रूप में पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र, नदी, वृक्ष एवं पशु-पक्षी आदि के बिना नहीं देखा गया है। भारतीय चिंतन में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा प्राचीन है। वेदों, पुराणों और उपनिषद आदि से लेकर कालिदास, घाघ, भड्डरी, पंत, प्रसाद आदि सभी के काव्य में पर्यावरण का वर्णन मिल जाएगा। भारतीय परम्परा में धार्मिक कृत्यों में वृक्ष पूजा का महत्व है। पीपल को अटल सुहाग से सम्बद्ध कर पूज्य माना गया है, तुलसी को भी पवित्र माना गया है। विल्व वृक्ष को भगवान शंकर का प्रिय माना गया है। आम्रपत्र, ढाक, पलाश, दूर्वा एवं कुश जैसी वनस्पतियों को नवग्रह पूजा आदि धार्मिक कृत्यों से जोड़कर संरक्षित किया गया है। यही नहीं बल्कि दादी-नानी की कहानियों में भी पेड़-पौधों के प्रति चिंता व्यक्त की जाती थी। वैज्ञानिकों एवं अन्य सभी विद्वानों ने एकमत होकर माना है कि हमारे सुखद जीवन के लिए सुखद पर्यावरण का होना आवश्यक है।
इन सभी उदाहरणों के बाद समझ लेना चाहिए कि हम महिलाओं को भी पर्यावरण के प्रति जागरूक रहना ही होगा तभी हम पर्यावरण को संरक्षित करने में कोई ठोस कदम उठा पाएंगी। सच तो यह भी है कि भारतीय महिलाएं पर्यावरण के प्रति सदैव जागरूक रही हैं। महिलाओं ने पर्यावरण संरक्षण को अपने तीज-त्यौहार से जोड़कर महती भूमिका निभायी है। हरियाली तीज हो अथवा फूल वाली दोयज, वट अमावस्या हो आॅवला एकादशी आदि तो होते ही हैं। महिलाएं तुलसी विवाह का आयोजन भी करती हैं, प्रतिदिन तुलसी को जल भी चढ़ाती हैं और अनेक अवसरों पर पीपल को भी पूजती हैं और वसंत पर भी पर्यावरण संरक्षण के रूप में ही पूजा करती हैं। दशहरा से पूर्व नवरात्र पर जौ बोती हैं और दशहरे के दिन जब यह जो पौधे बन जाते हैं तब बहनें भाइयों के कानों पर इन पौधों को रखती भी हैं। यही नहीं प्रत्येक छः महीने के बाद कलश में पानी उसके उपर आम की टहनी तथा उसपर नारियल रखकर नवरात्र की पूजा का उद्देश्य भी पर्यावरण ही है। इस प्रकार देखा जाए तो भारतीय संस्कृति में वनस्पति आम जीवन का मुख्य हिस्सा है और महिलाएं इसकी वाहक हैं। यही नहीं महिलाओं को जितना प्रेम वनस्पति से है उतना ही प्रेम नदी-नालों, तालाबों और मिट्टी से भी है। विवाहोत्सव में मिट्टी खोदकर लाना अथवा नदी या कु़एं से जल भरकर लाना पर्यावरण प्रेम को ही सिद्ध करता है। यह भी कहा जा सकता है कि पर्यावरण संरक्षण में महिलाओं का महत्वपूर्ण स्थान है। और हमें अपनी भमिका को कम नहीं करना है बल्कि हमें और जागरूक होना है।
महिलाओं का मतलब आधी आबादी है या यह भी कहा जा सकता है कि पर्यावरण की चिंता सिर्फ पुरुषों की ही चिंता नहीं बल्कि महिलाओं की भी उतनी ही बड़ी चिंता है। यदि महिलाएं ठान लें कि हमें किसी भी सूरत में पर्यावरण का संरक्षण करना है तो निश्चित ही एक बहुत बड़ी परेशानी से ही नहीं बचेंगे बल्कि अनेक ऐसी परेशानियों से भी हम बच सकते हैं जो अनायास ही हमें घेरे खड़ी रहती हैं। जिनमें सबसे पहले स्वास्थ्य पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव से भी हम बच सकते हैं। इसलिए हमें करना यह चाहिए कि वह सभी वजह तलाश करें जिनमें हमारी वजह से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है।
भारतीय महिलाएं प्रकृति प्रेमी हैं इस बात का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी हमें अपनी महत्ता को समझते हुए करना यह भी चाहिए कि हम कम से कम अपने घर को प्रकृति के अनुकूल बनाएं। जैसे अपने आंगन अथवा जहां कहीं भी खाली जगह हो वहां अपने प्रिय पौधे लगाएं और उन्हें फलने फूलने में मदद करें। यदि खाली जगह अधिक है तो कुछ साग सब्जियां भी उगायी जा सकती है। पानी का प्रयोग लापरवाही के साथ न करें। पाॅलीथीन का प्रयोग तो पर्यावरण के लिए एकदम विष का ही काम कर रहा है, प्रयास करें कि पाॅली बैग का उपयोग ही न करें। साबुन अथवा वाशिंग पाउडर का प्रयोग जितना कम करें उतना ही अच्छा है। ध्वनिप्रसारण यंत्रों का प्रयोग कम से कम करें। कहने का तात्पर्य है कि आधुनिक तो बनें मगर अपने पर्यावरण को खराब करने की शर्त पर नहीं।
यह बात भी सिद्ध है कि हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा। जग सुधरेगा तो हम सबके लिए हमारा पर्यावरण भी संरक्षित हो जाएगा। आज हमें मिले अधिकारों की कमी नहीं है। जो काम हम घर के लिए घर में रहकर कर सकते हैं वह तो करे हीं परन्तु हमें पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए कुछ कठोर भी बनना पड़ेगा। हमें बुरी चीजों का विरोध भी करना ही होगा। विरोध का तरीका भी सभ्य ही होना चाहिए। प्रातःकाल जब घूमने के लिए निकलें तो चिन्हित करें कि कहाँ कितनी गंदगी पड़ी है और जैसे भी संभव हो उस गंदगी का निस्तारण कराएं। रसोई में कुकिंग गैस का प्रयोग आवश्यक एवं सावधानीपूर्वक करें। खाने में भी हमें चयन करना होगा कि हम पर्यावरण के अनुकूल ही चीजें खाएं। कम शब्दों में कहूं तो ‘हमें अपने स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए जो भी प्राकृतिक उपाय किए जा सकते हैं कर लेने चाहिए। जीवन को बेहतर बनाने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास तो करना ही चाहिए मगर पर्यावरण को कोई नुकसान न हो इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए।
पर्यावरण की ही तरह हमारा शरीर भी प्राकृतिक तत्वों से मिलकर बना है। जिसका संरक्षण न सिर्फ हमारा नैतिक दायित्व है बल्कि अच्छा स्वास्थ्य पाने के लिए अत्यन्त आवश्यक भी है। यदि हम अपनी रसोई का रसायनशास्त्र, घर का वास्तुशास्त्र और बाहरी हवाओं के आने के लिए शुद्ध वातावरण को ध्यान में रखकर चलेंगे तो हमारा पर्यावरण स्वयं सुधर जाएगा। किन्तु बहनों! इसके लिए हमें सदैव प्रयासरत रहना ही होगा। पर्यावरण एक दो दिन की चीज नहीं बल्कि यह सतत प्रक्रिया है।

मंजु त्यागी
आदर्श नगर, नजीबाबाद

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *