दाम्पत्य जीवन और शक की छाया/मंजु त्यागी

दाम्पत्य जीवन में सामंजस्य आवश्यक है। सामान्य जीवन में शक, हीनता, श्रेष्ठता या अहम् की भावना को स्थान नहीं होना चाहिए। यह भावनाएं यदि पति और पत्नी के बीच आ जाती हैं तो निश्चित रूप से दाम्पत्य जीवन खतरे में पड़ा दिखायी देने लगता है। एक दूसरे पर शक करने का सीधा सा मतलब है, आपस में विश्वास की कमी का होना, और जहां विश्वास की कमी होती है वहाँ विघटन निश्चित है। एक दूसरे पर बेवजह दोषारोपण इस स्थिति को और भी भयावह बना देता है।
भारतीय सुंसकृति में जिन सोलह संस्कारों का महत्व है, उनमें विवाह को सर्वोपरी माना गया है। विवाह जीवन को सम्पूर्ण बनाता है। ‘विवाह‘ संस्कार ही परिवार रूपी मंदिर में प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करता है। परिवार वह व्यवस्था है, जिसे दम्पति अपने प्रयासों से सुनियोजित एवं व्यवस्थित करता है। पति-पत्नी दोनो के मूल में कर्तव्य होते हैं, अधिकारों की जंग यहाँ नहीं होती है। यहाँ पति-पत्नी दोनों को ही अपनी-अपनी प्रतिभा और दूरदर्शिता का परिचय देना होता है। इसे गृहस्थ जीवन भी कहते हैं, जिसमें चुनौतियाँ, समस्या और संकट का सामना हो ही जाता है। यदि दाम्पत्य जीवन में शक जैसी स्थिति नहीं है, तो पति-पत्नी अपने विवेकपूर्ण कार्यों से सभी समस्याओं का निराकरण सरलता के साथ कर लेते हैं। और यदि पति पत्नी के मध्य शक जैसी बीमारी ने अपने पैर फैला दिये हैं, तो फिर किसी भी समस्या का सामना करना सरल नहीं होता है। दाम्पत्य जीवन में शांति-समृध्दि को भारतीय संस्कृति में प्राथमिकता दी गयी है। शायद इसीलिये पति-पत्नी के रिश्ते को न सिर्फ अटूट बल्कि सात जन्मों का बंधन माना गया है। दाम्पत्य जीवन ही परिवार की नींव होती है। और शक दीमग की तरह इस सुदृढ़ नीव को चाटने लगे तो दाम्पत्य जीवन की बुलन्द इमारत अधिक समय तक खड़ी नहीं रह पाती है।

इधर कुछ वर्षों में तलाक की घटनाओं में उबाल आया है। लगता है, मन, वचन, कर्म, धर्म से निभाने वाले पति-पत्नी के रिश्ते को किसी की नजर लगने लगी है। आज के इस भौतिकवादी युग में अधिकारों की मांग के चलते रिश्ते में व्यापक परिवर्तन आया है। समर्पण की भावना तो जैसे मृत ही हो गयी है। अधिकांश तलाक की वजह आपस में एक दूसरे पर शक किया जाना ही होता है। दाम्पत्य जीवन विश्वास पर टिका होता है। इसमें शक के लिए कोई स्थान नहीं होता। यदि समय रहते शक की छाया से बाहर न निकला जाए तो दाम्पत्य जीवन का कोई मतलब नहीं रह जाता है। ऐसे न जाने कितने ही दम्पति हैं, जिनके जीवन को शक की छाया ने घेर रखा है, और उनके जीवन में कड़वाहट घुल गयी है। निरन्तर कलह के कारण न जाने कितने ही परिवार उजड़ चुके हैं। कितने बच्चे अनाथ हो चुके हैं और कितने ही माँ-बाप ने अपनी संतानों को खो दिया है। शक कहने मात्र को दो अक्षर का शब्द है मगर जिसके जीवन में यह छा जाये समझो पूरी तरह बर्बाद करके रख देता है।
अधिकांश दम्पति के मध्य शक की बड़ी वजह पैसा और समय ही होती है। यदि पति अनावश्यक रूप् से कहीं अधिक समय व्यतीत करता है अथवा अनावश्यक रूप् से धन खर्च करता है तो पत्नी को शक होना स्वाभाविक है। यही बात पत्नी पर भी लागू होती है। जबकि यह दोनो ही वजहें अनावश्यक और विघटनकारी होती हैं। याद रखिये कि यदि एक बार आपके मस्तिष्क में शक की छाया पड़ गयी तो वह जीवनपर्यन्त बनी रह सकती है। इसलिये बेहतर यही है कि पति और पत्नी एक दूसरे को भरपूर समय दें, पैसा खर्च करने की मिलकर योजना बनायें। आकस्मिक रूप से हुए खर्च को एक दूसरे से साझा करें। यदि ऐसा करते हैं तो दाम्पत्य जीवन में शक पनप ही नहीं पायेगा।
खास बात ये है कि पति-पत्नी के मध्य शक की कोई ठोस वजह भी नहीं होती है। बस अपने अपने मनों के आग्रह होते हैं। ऐसे अनेक दम्पति आपको मिल जायेंगे जहां पति बहुत ही खूबसूरत और पत्नी साधारण भी नहीं या फिर पत्नी बहुत ही खूबसूरत है और पति साधारण भी नहीं। ऐसी स्थिति एक दूसरे में हीन भावना पैदा कर देती है। पति और पत्नी एक दूसरे को हमेशा शक की दृष्टि से देखते हैं। पत्नी ने यदि पति को किसी अन्य स्त्री से हँस कर बातें करते हुए देख लिया तो तुरंत उससे सम्बन्ध स्थापित कर देती हैं और सोचती हैं कि कहीं दाल में काला तो नहीं है। यदि उस स्त्री ने पत्नी के सामने उसके पति की प्रशंसा कर दी तो समझो शक पुख्ता हो गया। पत्नी की निगाह में निश्चित ही उसके पति के साथ कोई सम्बन्ध है।
कई बार पति-पत्नी में से किसी एक का खूबसूरत होना भी तनावपूर्ण वातावरण स्थापित कर देता है। अब इसे पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव कहें या आगे निकल जाने की होड़। जो भी हो यह स्थिति भी अब भारतीय दाम्पत्य जीवन रूपी पवित्र रिश्ते में जहर घोल रही है। भौतिक उन्नति के लिए आत्मिक उन्नति को बलि चढाया जा रहा है। अकसर छोटी-छोटी बातों को लेकर पति-पत्नी इस हद तक झगड पडते हैं कि उनकी जिंदगी में सिर्फ तनाव ही रह जाता है, जो उन पर इस हद तक हावी हो जाता है कि दोनों का एक छत के नीचे जीवन जीना दूभर हो जाता है, स्थिति तलाक तक पहुंच जाती है।

दाम्पत्य जीवन, जीवनपर्यन्त चलने वाला सम्बन्ध होता है, जो समर्पण और त्याग चाहता है। यह कोई व्यवसाय नहीं है जिसमें धोखा या बेइमानी का शक पालकर एक-दूसरे से व्यवहार किया जाए। दाम्पत्य जीवन पूरी तरह वयस्क होता है। भविष्य के सभी सपने साथ मिलकर देखे जाते हैं। जब सपने साकार होते हैं, तो उनका आनन्द भी मिलकर लिया जाता है। दाम्पत्य जीवन सृष्टि निर्माण का मूल आधार है। जिस पर बड़ी-बड़ी सभ्यताएं खड़ी होती हैं।

कोई भी घर पति-पत्नी दोनों का होता है। दोनों मिलकर घर को संवारते हैं। दाम्पत्य जीवन तथा परिवार में प्रेम की पूंजी बढाने के लिए शक से बचें। आपस में विचार विमर्श करें। एक दूसरे पर विश्वास रखें, अहंकार की भावना को त्यागकर समर्पण को स्थान दें। समझदारी और सामंजस्य से पति-पत्नी अपनी आवश्यकताओं, इच्छाओं की पूर्ति करें। पति-पत्नी को चाहिए कि वे एक दूसरे को समझें और एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें। अपने बीच शक को न आने दें। घर की समस्या घर में ही सुलझा लें। यदि पति को आॅफिस से आने में देर हो जाए तो मन में बुरे विचार न पालें, यही बुरे विचार शक को जन्म देते हैं। दोनों ही एक दूसरे की इच्छाओं का सम्मान करें और एक दूसरे के माता-पिता को समान रूप से सम्मान दें। अपनी इच्छाओं को दबाएं नहीं, व्यक्त करें, मगर उन्हें एक दूसरे पर थोपें नहीं, न ही इच्छापूर्ति के लिये एक दूसरे पर दबाव ही डालें। एक दूसरे के अतीत को कुरेदने का प्रयास भी न करें। भविष्य के महत्व को समझें।

पत्नियां बार-बार पति को ऑफिस में फोन न करती रहें। यह बहुत गलत आदत है। अगर एक-दो बार कोशिश करने पर भी पति फोन नहीं उठा रहा, थोड़ा इन्तजार करें, हो सकता है किसी जरूरी काम के चलते वे फोन न उठा पा रहे हों। हर बात पर शक या सवाल न करें और वक्त बे वक्त पति के ऑफिस न पहुँच जाएं। पति को भी चाहिये कि वह भी पत्नी पर शक न करे। जिस तरह पति के अपने दायरे होते हैं, उसी तरह पत्नी के भी अपने दायरे होते हैं। दोनों को एकदूसरे के दायरों का पता होना चाहिये और एक दूसरे से जुड़ी गतिविधियों पर चर्चा भी होनी चाहिये। यदि पति-पत्नी दोनो कामकाजी हैं, तो अधिक समझदारी की आवश्यकता होती है। दोनो की अपने-अपने कार्यक्षेत्र की समस्याएं भी होती हैं। जिनका हल पति-पत्नी आपसी चर्चा के दौरान तलाश लेते हैं।

एक बात बड़ी साफ सी है-जो रिश्ते निभाये जाने वाले होते हैं, उन्हें आजमाया नहीं जाना चाहिये, क्योंकि आजमाईश के दौरान शक को स्थान मिल ही जाता है। दाम्पत्य जीवन में साथी से अपनी इच्छाओं की पूर्ति के स्थान पर यह सोचना चाहिये कि साथी की इच्छापूर्ति कैसे की जाये। यदि पति-पत्नी को परिवार रूपी गाड़ी के दो पहिये कहा जाता है, तो इस समान भावना का सम्मान व्यवहारिक जीवन में भी करना चाहिये। भारतीय संस्कृति में यदि पति को परमेश्वर कहा जाता है तो पत्नी को भी पूज्या कहा गया है।

जिस दाम्पत्य जीवन को एक बार शक की छाया घेर लेती है, वह जीवन नरक समान हो जाता है। कलह, चिढ़न, ईष्र्या, ताने, अपेक्षा आदि विकार दाम्पत्य जीवन को घेर लेते हैं, और जिस दाम्पत्य जीवन में शक की छाया का कोई स्थान नहीं होता, वहाँ-समर्पण, प्रेम, त्याग, एक दूसरे का खयाल रखा जाता है। बिना शक वाला दाम्पत्य जीवन स्वर्ग समान बन जाता है। स्वस्थ दाम्पत्य जीवन ही, स्वस्थ समाज का निर्माण करता है, और ऐसे ही दम्पति की संताने सुसभ्य और सुसस्ंकृत होती हैं। जिनके कंधों पर भविष्य का निर्माण होता है।
ईष्र्या और असुरक्षा का भय, शक को जन्म देता है। प्रयास किया जाये कि ईष्र्या को अपने मन में स्थान न दें और बिना किसी ठोस वजह के अपने मन में डर न पालें। जीवन अनमोल है, इसे भरपूर खुशियों के साथ जियें।

दाम्पत्य जीवन, जीने की आधारशिला है- प्रेम, त्याग, समर्पण, सहयोग, सदभावना, संस्कार, सौम्यता, शिष्टाचार, समदृष्टिकोण, क्षमाशीलता आदि सदगुण, न कि शक। शक की बुनियाद पर दाम्पत्य जीवन कदापि नहीं चलता है। इसलिये शक की छाया से दूर रहें और सुखी दाम्पत्य जीवन यापन करें।

मंजू त्यागी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *