सुन्दर प्रेम / के.एस. तूफ़ान

विजय डिग्री काॅलेज में आया तो उसने अपने अंदर बदलाव महसूस किया। इंटर में उसने अपनी कक्षा में ही नहीं बल्कि जिले भर में नाम किया। परिणाम आते ही अखबार वाले उसके घर दौड़ पड़े थे। सबने उसकी फोटो खींची और उसकी आगे की मंजिल पूछी। उसकी डाक्टर बनने की ख्वाहिश सबको पता चल गई। नगर के बेहतरीन डिग्री काॅलेज में उसे सरलता के साथ प्रवेश मिल गया।

डिग्री काॅलेज में प्रवेश मिलते ही उसने नई किताबें अरेंज कीं और पुनः पढाई में मन लगाने लगा। लेकिन इस बार वह यह भी अनुभव कर रहा था कि पढाई में उसका अधिक मन नहीं लग पा रहा है। वह कल्पनालोक में अधिक खोया रहता है, उसने अपने एक मित्र से कहा- ‘पता नहीं क्यों, आजकल पढाई में मन नहीं लग पा रहा है?’ तो उसके मित्र पंकज ने तपाक से कहा-‘मन तो कहीं ओर लगा है, पढाई में क्या खाक लगेगा?’

-‘मतलब!’ विजय जैसे भौचक्का रह गया, उसने आश्चर्यचकित हो, जानना चाहा तो उसके मित्र पंकज ने बिना किसी लागलपेट के उत्तर दिया-‘मन तो विनीता में लगा है।’

मित्र की बात सुनकर विजय हैरान था। उसने पहलू बचाने की कोशिश की मगर अपने आप से कैसे बच सकता था। पंकज तो यह बात कहकर वहाँ से चला गया, गोया कि उसके लिए मामूली बात हो मगर विजय तो जैसे बेचैन हो उठा, उसका दिल और दिमाग बेकाबू हो रहा था। वह द्वंद्व में फंस रहा था। दिल कहता था कि विनीता से वह प्यार कर बैठा है और दिमाग कहता था कि यह ठीक नहीं है। वह विनीता को कब प्यार कर बैठा उसे स्वयं ही पता नहीं चल सका था। उसने तो काॅलेज में प्रवेश लिया और लग गया था पढाई करने में। हाँ इस बार यह जरूर हो रहा था कि किताब हाथ में लेने के बाद कल्पनालोक में खो जाने लगा था। कई बार तो यह होता कि किताब उसके हाथों से छूट जाती और वह सो जाता। घर वाले समझते कि वह इस बार भी मन लगाकर पढ रहा है। काॅलेज जाता तो प्रोफेसर का लेक्चर सुनते-सुनते भी वह कल्पनालोक में खो जाता। चोरी-चोरी वह विनीता की ओर देखता। विनीता की नागिन सी लहराती बालों की चोटी में उसे असीम आनंद की अनुभूति होती थी। उसने इस बात का जिक्र किसी से भी नहीं किया था किंतु अब वह यह बात जानकर हैरान था कि उसका मित्र पंकज, जो कि उसका सहपाठी भी था, इस बात को जानता था। जाहिर है, कक्षा के दूसरे छात्र भी इस बात को जान गए होंगे। अब यही बात विजय को परेशान भी करने लगी थी। वह सोचने लगा था- ‘कहीं उसके परिवार को इस बात का पता चल गया तो?’

समय तीव्र गति से बीतता जा रहा था। उसने पुनः किताबों में मन लगाने का प्रयास किया। लगा भी, मगर अब वह बात नहीं रही थी। मन तो वैसे भी चंचल है, बड़े-बड़े बिगड़े हुए हाथी घोड़ों को काबू में कर लिया जाता है मगर एक बार मन उचट गया तो उसे काबू में करना अत्यंत मुश्किल हो जाता है। यही हाल विजय का हो रहा था। उसका मन तो विनीता में खो चुका था।

विनीता एक होशियार छात्रा थी। उसने भी जिले भर में नाम किया था। उसके और विजय के अंक लगभग बराबर ही थे। वैसे भी आजकल लड़कियां लड़कों की अपेक्षा अधिक अंक पाकर उत्तीर्ण हो रही हैं। विजय ने कभी पहले विनीता को देखा तक नहीं था। कक्षा प्रारंभ हुई तो वह हैरान था। टीवी में देखी गई खूबबसूरत नायिकाओं से कम वह नहीं लगी थी। लंबा कद, गोल चेहरा, गौरा रंग और कूल्हे से नीचे तक झूलती बालों की चोटी ने उसे दीवाना कर दिया था। ऐसी खूबसूरती उसने फिल्मों में ही देखी थी।

पता चला कि विनीता उसी के मोहल्ले में रहती है और वह अपनी ननिहाल में रहकर पढ रही है। उसके पिता अधिकांश विदेश में रहते हैं और माँ सरकारी नौकरी में है। विनीता के मामा नगर की हस्तियों में शुमार होते हैं। विजय ही विनीता को चाहता है, विनीता उसे चाहती है इसका संकेत एक बार भी नहीं मिला था। घर और समाज से डर की ही वजह थी कि विजय ने इस तरफ प्रयास भी नहीं किया था।

एक दिन विजय पुस्तकालय में बैठा पढ रहा था। तभी कुछ लड़कियों के साथ विनीता भी वहाँ आ गई। विजय का दिल धक-धक करने लगा। विनीता ने कोई किताब काउंटर पर जमा की और जाने लगी, तभी उसकी निगाह विजय पर पड़ी। वह बिना किसी भूमिका के विजय के सामने बैठ गई। विजय की बेचैनी बढ गई। वह संभल पाता कि उसके पहले ही विनीता ने उससे पूछा-‘क्या चाहते हो मुझसे?’ विजय कोई जवाब दे पाता, उससे पहले ही विनीता पुनः बोली-‘ख्वाब देखने छोड़ दो और अपनी पढाई में मन लगाओ, पढ-लिख लोगे तो जीवन बन जाएगा।’

विनीता की बात सुनकर विजय ने बनते हुए पूछा था- ‘मैं तुम्हारी बात का मतलब नहीं समझा।’ तब विनीता ने बिना किसी भूमिका के कह दिया-‘बनने की कोशिश मत करो, पूरी कक्षा जान गई है कि तुम्हारा मन पढने में नहीं लग रहा है, मैं नहीं चाहती हूँ कि मेरी वजह से किसी की जिंदगी खराब हो। अपना मन पढाई में लगाओ और डाक्टर बनकर दिखाओ।’ कहती हुई विनीता तो वहाँ से चली गई मगर विजय के सारे ख्वाब बिखर गए। निःशब्द विजय उस दिन वहाँ घंटों बैठा रहा और जब वहाँ से घर पहुँचा तो फिर कई दिन तक काॅलेज नहीं गया।

लगभग पंद्रह दिन लग गए थे, विजय को सामान्य होने में। उसके अनेक मित्रों ने तब उसकी मजाक भी बनाई थी और विनीता ने उसकी तरफ देखा भी नहीं था।

इस घटना को पंद्रह वर्ष से भी अधिक समय हो गया था। बीएससी करते करते विजय ने एमबीबीएस की पढाई के लिए मेडिकल काॅलेज में प्रवेश ले लिया था और उससे अपना शहर अपने मित्र सभी छूट गए थे। उसने मन लगाकर डाॅक्टरी की पढाई की और आज वह अपने नगर का जानामाना डाक्टर बन गया है। सभी उसका सम्मान करते हैं और वह भी तो कम फीस लेकर सभी का अच्छा इलाज करता है।

-क्या हुआ डाक्टर साहब? उस महिला पेशेंट ने पूछा जिसके पर्चे पर लिखे नाम को विजय लगातार अंडरलाईन करता जा रहा था।

विजय हड़बड़ाता हुआ संभला। वह एक शब्द भी बोले बिना पेशेंट की ओर देखने लगा। पेशेंट ने विजय की आंखों में झांकते हुए कहा-‘मैं बीएससी तक पढी हूँ, एयरफोर्स में सीनीयर अधिकारी से मेरी शादी हो गई थी। वह अब इस दुनिया में नहीं रहे हैं और एक आठ वर्ष की बेटी की माँ हूँ। बेटी पढ रही है बिल्कुल मुझ पर ही गई है। अब मुझे दवाई दे दो, तेज बुखार है।’

विजय ने पर्चे पर दवाई लिखी। पर्चा पेशेंट को थमाया और अपनी अँगुलियों की पोर से अपनी आँखों की कोरें पौंछ डाली।

पर्चा हाथ में लेते हुए उस महिला पेशेंट ने मुस्कुराते हुए पुनः कहा-‘डाॅक्टर को इतना भावुक नहीं होना चाहिए।’

विजय ने कोई जवाब नहीं दिया। वह पेशेंट कोई और नहीं बल्कि विनीता ही थी। विजय सोच रहा था कि विनीता आज भी उतनी ही खूबसूरत है जितनी पंद्रह साल पहले थी। उसके बोलने का लहजा भी वही है और विधवा होने की असहनीय पीड़ा को भी वह कितनी चतुराई से छिपाकर मुस्कुरा रही है।

अगले दिन जब विनीता अस्पताल आई तो वह गंभीर थी। जरूर कोई बात थी। विजय के केबिन में पहुंचते ही उसने विजय के पाँव छुए। विजय पहले की ही तरह शांत था। विनीता ने कहा-‘आप वास्तव में देवता हैं’ कहते हुए वह रोने लगी। विजय ने अपने रुमाल से उसके आंसू पौंछे तो वह मुस्कुरा उठी। उसने कहा-‘और आशिक भी।’

बदले में विजय सिर्फ मुस्कुरा दिया था।

-मेरे लिए पूरी जिन्दगी गुजार दोगे और बताओगे भी नहीं, मैंने तो कल्पना भी नहीं की थी।’ विनीता ने कहा तो विजय को लगा कि उसने कोई बड़ा काम कर दिया है।

विनीता विजय की आंखों में झांकती हुई बोली-‘जानते हो मैं विधवा हूँ और मेरे पास एक बेटी भी है। फिर भी अपने पिता जी को मेरा हाथ माँगने के लिए भेज दिया।’

विजय फिर भी नहीं बोला। उसने सिर्फ गरदन से इशारा किया कि हाँ मैं जानता हूँ।

-‘कुछ बोलोगे भी कि अब भी मौन ही रहोगे?’ विनीता ने शर्माते हुए कहा तो विजय बोल ही उठा- ‘मैंने तुम्हारे लिए सच्ची तपस्या की है और प्रेम की इस तपस्या में मौन का कितना आनन्द है यह मैं ही जानता हूँ। सच सदैव सुन्दर होता है।’

-ठीक है, बारात लाने की जरूरत नहीं है, हम अदालत में जाकर विवाह करेंगे।’ विनीता ने कहा तो विजय ने फिर स्वीकृति में गरदन हिला दी।
के. एस. तूफ़ान
ग्राम व पो. भनेड़ा
जिला बिजनौर
मो.- 9456247677

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