कर्जमाफी ही समस्या का एकमात्र हल नहीं/ -अरविंद जयतिलक

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने कैबिनेट की पहली बैठक में ही लघु एवं सीमांत किसानों के एक लाख रुपए तक का फसली ऋण माफ कर विधानसभा चुनाव में किए गए वादे को निभा दिया है। इस निर्णय से तकरीबन 2.15 करोड़ किसान लाभान्वित होंगे वहीं सरकार के माथे पर 36,359 करोड़ रुपए का बोझ बढ़ेगा। सरकार ने सात लाख उन लघु एवं सीमांत किसानों को भी राहत दी है जिनके फसली ऋण गैर निष्पादक आस्तियों (एनपीए) में तब्दील हो गए हैं। निःसंदेह इस निर्णय से कर्ज के बोझ तले दबे किसानों को राहत मिलेगी और कृषि के प्रति उनका आकर्षण बढ़ेगा। लेकिन कर्जमाफी के लिए हजारों करोड़ रुपए का बंदोबस्त करना सरकार के लिए भी आसान नहीं होगा। पहले से ही उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतरी हुई है और राज्य पर तकरीबन पौने चार लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। सरकार को कर्जमाफी के लिए अन्य योजनाओं को आवंटित धन में कटौती करनी पड़ सकती है। इससे योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। वैसे भी केंद्र सरकार से राज्य सरकार को कर्जमाफी के लिए मदद मिलने वाला नहीं है। केंद्र सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि जो राज्य किसानों के कर्जे माफ करना चाहें वे उसका खर्च स्वयं उठाएं। दो राय नहीं कि अगर केंद्र सरकार कर्जमाफी के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को मदद करती तो देश के अन्य राज्य भी उससे मदद के लिए गुहार लगाते। वैसे भी हर राज्य से कर्जमाफी की मांग उठ रही है और आंदोलन तेज हो रहे हैं। उधर, मद्रास उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में तमिलनाडु सरकार को राज्य में सूखे से प्रभावित सभी किसानों का कर्जा माफ करने का निर्देश दिया है। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि चूंकि तमिलनाडु सरकार की आर्थिक स्थिति कमजोर है इसलिए केंद्र सरकार को इस मुश्किल हालात में तमिलनाडु की आर्थिक मदद करनी चाहिए। तमिलनाडु की तर्ज पर सूखा व बाढ़ से प्रभावित अन्य राज्य भी आर्थिक बदहाली का हवाला देकर न्यायालय में केंद्र सरकार से कर्जमाफी का गुहार लगा सकते हंै। यह संभव है कि इस मामले में न्यायालय उदार दिखे और केंद्र व राज्य सरकारों को कर्जमाफी के मजबूर होना पड़े। अगर ऐसा हुआ तो राज्यों की आर्थिक बदहाली बढ़ेगी। अगर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की ही बात करें तो इसका कुल बजट तकरीबन 2.5 लाख करोड़ रुपए के आसपास है। इनमें से तकरीबन एक लाख करोड़ रुपए कर्मचारियों के वेतन और पेंशन में चला जाता है।

 

इसी तरह एक बड़ा हिस्सा कर्ज के ब्याज के भुगतान में जाता है। अगर इस बजट का 36,359 करोड़ रुपए कर्जमाफी की भेंट चढ़ता है तो फिर राज्य की आर्थिक सेहत बिगड़ना तय है। लेकिन राज्य सरकार का कहना है कि कर्जमाफी के निर्णय से राज्य की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। उसकी दलील है कि इसका सकारात्मक असर होगा क्योंकि प्रदेश की 78 फीसद जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और उनमें से 68 फीसद परिवार कृषि पर अवलंबित हंै। लिहाजा कर्जमाफी से सूखा, बाढ़ और आपदा की मार से त्रस्त किसानों को उबरने में मदद मिलेगी। कर्जमाफी से उत्साहित किसान कृषि कार्य के प्रति उन्मुख होंगे और कृषि विकास दर में वृद्धि होगी। सरकार का तर्क यह भी है कि कर्जमाफी से 2016-17 में राज्य के सकल घरेलू उत्पादन की जो अनुमानित वृद्धि दर 7.5 फीसद है, उसमें भी उछाल आएगा। प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि होगी। देखना दिलचस्प होगा कि कर्जमाफी से बदहाल किसानों के जीवन में कितना बदलाव आता है और अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है। लेकिन इस फैसले से बहुतेरे सवाल उठ खड़े हुए हैं। सवाल उठने लगा है कि क्या इस निर्णय से किसानों में ऋण लेने की प्रवृति नहीं बढ़ेगी? क्या किसान इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचेगे कि हर नई सरकार उनका कर्ज माफ करेगी? क्या राजनीतिक दलों में यह धारणा नहीं पनपेगी कि कर्जमाफी के दांव से सत्ता तक पहुंचा जा सकता है? निःसंदेह किसानों का मदद जरुरी है और एक सीमा तक उनका कर्ज भी माफ किया जाना चाहिए। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि कर्जमाफी को सियासत का औंजार बना लिया जाए। इससे राज्यों की आर्थिक सेहत बिगड़ेगी और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार रुकेगा। यहां ध्यान रखना होगा कि 2008 में मनमोहन सिंह की नेतृत्ववाली यूपीए सरकार ने किसानों का तकरीबन साठ हजार करोड़ रुपए माफ किया था। राहत पाने वाले ज्यादतर किसान महाराष्ट्र राज्य के थे।

 

विडंबना यह है कि एक बार उनके कर्जमाफी की मांग मुखर होने लगी है। क्या यह रेखांकित नहीं करता है कि किसानों की कर्जमाफी सियासत का औंजार बनती जा रही है? इस बात की क्या गारंटी है कि पांच वर्ष बाद जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होगा पुनः कर्जमाफी की मांग नहीं उठेगी? बेहतर होगा कि उत्तर प्रदेश की सरकार कर्जमाफी के फैसले के बाद अब किसानों की सेहत सुधारने एवं कृषि उत्पादन में वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाए ताकि भविष्य में पुनः कर्जमाफी की नौबत न आए। यह तभी संभव होगा जब उत्तर प्रदेश सरकार किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में पहल करेगी। इसके लिए सबसे पहले सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करना होगा। आंकड़ों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश के कुल प्रतिवेदित क्षेत्रफल 240.93 लाख हेक्टयर में से सकल सिंचित क्षेत्रफल 199.01 लाख हेक्टेयर और शुद्ध सिंचित क्षेत्रफल 138.09 लाख हेक्टेयर ही है। कुल सिंचित क्षेत्र में 18.5 फीसद नहरों से, 73.6 प्रतिशत नलकूपों से तथा 6.8 प्रतिशत कुओं, तालाबों, झीलों, पोखरों तथा शेष अन्य साधनों से होता है। वर्तमान में प्रदेश में 73997 किमी लंबा नेटवर्क, 49010 डेªनेज नेटवर्क, 28 अदद मेजर पंप कैनाल, 30133 ट्यूबेल, 21 मेजर जलाशय एवं 25 मेजर बैराज हैं। इस समय उत्तर प्रदेश में कुल 188.40 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य क्षेत्रफल है जिसके सापेक्ष 126.57 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल पर सिंचाई सामथ्र्य सृजित किया गया है। यानी 65 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल पर ही सिंचाई सामथ्र्य उपयोग में है। जबकि 35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र अभी भी असिंचित हैं जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। राज्य सरकार को सिंचाई की दायरा का विस्तार करना चाहिए। इससे किसानों की मानसून पर निर्भरता कम होगी और सूखे के कारण आत्महत्या का सिलसिला थमेगा। सरकार को चाहिए कि वह कृषि फसलों को सिंचाई से संतृप्त करने के लिए निःशुल्क बोरिंग योजना के तहत सामान्य श्रेणी के लघु, सीमांत तथा अनुसूचित जाति-जनजाति के किसानों को आर्थिक मदद दे ताकि उन्हें आर्थिक रुप से समृद्ध बनाया जा सके। सरकार को उन्नत बीज और सब्सिडी युक्त खाद भी उपलब्ध कराना होगा। अच्छी बात है कि सरकार ने किसानों के फसल को उचित मूल्य पर खरीदने का भरोसा दिया है। 80 लाख मिट्रिक टन गेहूं खरीद का लक्ष्य रखा है और धन का भुगतान सीधे किसानों के खाते में हो इसकी व्यवस्था सुनिश्चित की है। लेकिन यहां ध्यान रखना होगा कि किसानों की दुर्दशा के लिए केवल कर्ज ही नहीं बल्कि अन्य बहुतेरे कारण भी जिम्मेदार हैं जिनमें खेती के विकास में क्षेत्रवार विषमता का बढ़ना, प्राकृतिक बाधाओं से पार पाने में विफलता, भूजल का खतरनाक स्तर तक पहुंचना और हरित क्रांति वाले इलाकों में पैदावार में कमी, फसलों और बाजारों में दूरी, फसलों का उचित मूल्य न मिलना, कृषि में मशीनीकरण और आधुनिक तकनीकी का अभाव प्रमुख है। हालांकि सरकार राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, गुणवत्तापरक बीज के उत्पादन व वितरण तथा राष्ट्रीय बागवानी मिशन के जरिए कृषि की सेहत सुधारने की कोशिश कर रही है लेकिन अभी अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिल रहे हैं। बेहतर होगा कि इन कार्यक्रमों को और अधिक धार दिया जाए। उचित यह भी होगा कि सरकार कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने के साथ-साथ गैर-कृषि क्षेत्र को भी प्रोत्साहित करे ताकि ग्रामीण जनता की कृषि पर निर्भरता कम हो। गत वर्ष पहले वल्र्ड वाॅच संस्थान की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि 1980 से 2011 के दरम्यान भारत में कृषि में लगी आबादी में 50 फीसद का इजाफा हुआ है।

 

हालांकि गौर करें तो वैश्विक स्तर पर इस अवधि के दौरान कुल आबादी के हिस्से के रुप में कृषि आबादी कम हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक 2011 में विश्व की कृषि में लगी आबादी 37 फीसद थी और यह 1980 की संख्या के मुकाबले 12 फीसद की गिरावट दर्शाता है। हाालंकि संख्या के स्तर पर समान अवधि के दौरान यह आबादी 2.2 अरब से बढ़कर 2.6 अरब हो गयी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन में ऐसी आबादी में 33 फीसद की वृद्धि हुई है जबकि अमेरिका में कृषि से जुड़ी आबादी 37 फीसद कम हुई है। यह दर्शाता है कि विगत तीन दशक में जिस तरह अमेरिका में बड़े पैमाने पर मशीनीकरण, उन्नत फसल किस्में के आने, उर्वरकों, कीटनाशकों और संघीय सब्सिडी के कारण कृषि अर्थव्यवस्था पहले से सुसंगठित हुई है और गैर कृषि-क्षेत्र में रोजगार बढ़ा है वह स्थिति भारत में नहीं बन पायी है। इसके लिए सरकारों की कृषि नीतियां जिम्मेदार है। ऐसे में यह समझना आवश्यक है कि कर्जमाफी ही किसानों की समस्या का एकमात्र हल नहीं है। बहुतेरे अन्य कारणों पर भी विचार करना होगा।

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