संगीत पर मजहबी पहरेदारी/ -अरविंद जयतिलक

संगीत कभी सीमाओं की खोल में नहीं रहा। उसे कभी भी मजहब और संस्कृति के डोर से बांधकर नहीं रखा गया। पर आघातकारी है कि कुछ कठमुल्ले, मुल्ला-मौलवी और मजहबी संगठन तुगलकी फतवे के जरिए असोम की गायिका नाहिद अफरीन की गायकी पर बंदिश लगाना चाहते हैं। उनकी दलील है कि किसी भी मुस्लिम लड़की का मंच पर प्रस्तुति देना शरिया कानून के खिलाफ है। उल्लेखनीय है कि असोम की गायिका नाहिद अफरीन म्यूजिकल रिएलिटी टीवी शो इंडियन आॅइडल जूनियर की फस्र्ट रनर अप रही हैं और 25 मार्च को असोम की उदाली में उनका प्रोग्राम होना है। इससे बौखलाए कुछ मजहबी संगठनों ने फतवे जारी कर मोर्चा खोल दिया है। लेकिन नाहिद अफरीन भी ऐसे फतवों से डरने वाली नहीं है। उसने दो टुक सुना दिया है कि संगीत उसकी जिंदगी है और वह ताउम्र गाती रहेगी। अच्छी बात है कि भारत के तमाम सेलिब्रेटिज नाहिद अफरीन की हौसलाआफजाई कर रहे हंै और असोम की सरकार भी उसे सुरक्षा का भरोसा दिया है। गौर करें तो यह पहला वाकया नहीं है जब मजहबी संगठनों द्वारा संगीत पर पहरेदारी की कोशिश हुई है। ऐसा ही एक फतवा गत वर्ष पहले जम्मू-कश्मीर में राॅक बैंड ‘प्रगाश’ चलाने वाली दसवीं की तीन छात्राओं के खिलाफ भी जारी किया गया था जो अपने हुनर के जरिए संगीत को प्रोफेशन बनाना चाहती थी। लेकिन मजहबी कट्टरपंथियों के डर से उन्हें घुटने टेकना पड़ा। तब भी कठमुल्लों ने दलील दी थी कि इस्लाम में नाच गाने और संगीत के लिए कोई स्थान नहीं है। औरतों के लिए तो बिल्कुल ही नहीं। गिटार को भी गैर इस्लामिक वाद्य बताया। अभी कुछ दिन पहले ही मंगलोर में 22 वर्ष की गायिका सुहाना सईद को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया कि उसने कन्नड़ रिएलिटी शो में भजन गाया। समझना कठिन है कि जब कभी भी संगीत को इस्लाम के खिलाफ नहीं माना गया तो आज मुफ्ती और मौलाना संगीत के खिलाफ फतवा जारी कर नाहिद अफरीन जैसी उभरती गायिकाओं को डराने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? शरीया का हवााला देकर संस्कृति और परंपराओं की अनदेखी क्यों कर रहे हैं? जब सुरैया, नूरजहां, सलमा आगा, मुबारक बेगम, दिया खान इत्यादि फिल्मों में गा सकती हैं तो फिर नाहिदा अफरीन पर पाबंदी क्यों?

 

मुल्ला-मौलवियों को इस बात का इल्म होना चाहिए कि सूफी संतों और मुस्लिम शासकों ने कभी भी गीत-संगीत को इस्लाम से अलग नहीं रखा और न ही उसे गैर इस्लामिक करार दिया। इस्लाम के 1400 साल के इतिहास में संगीत रचा-बसा है। जब तुर्क भारत आए तो अपने साथ ईरान और मध्य एशिया के समृद्ध अरबी संगीत परंपरा भी ले आए। उसे बुलंदियों तक पहुंचाया और कई रुप-रंग, नाम दिए। अगर संगीत गैर इस्लामिक होता तो क्या वे उसे अपने जीवन और आचरण में ढ़ालते? दिल्ली सल्तनत के शासक बलबन, जलालुद्दीन, अलाउद्दीन खिलजी और मुहम्मद तुगलक के दरबारों में संगीत सभाओं का आयोजन होता था। बलबन का पुत्र बुगरा खां और पौत्र कैकूबाद के समय राजधानी की गलियां और सड़कें गजल गायकों से भरी रहती थी। इतिहासकर बरनी ने उस समय के मशहूर संगीतकारों शाहचंगी, नूसरत खातून और मेहर अफरोज का जिक्र किया है जो अपने संगीत से समां बांधते थे। अलाऊद्दीन खिलजी जो इस्लाम के प्रति आस्थावान था, के दरबार में महान कवि एवं संगीतज्ञ अमीर खुसरो को संरक्षण हासिल था। खुसरो ने भारतीय और इस्लामी संगीत शैली को मिलाकर यमन उसाक, मुआफिक, धनय, फरगना और मुंजिर जैसे राग-रागनियों को जन्म दिया। उसने दक्षिण के महान गायक गोपाल नायक को दरबार में आमंत्रित किया। मध्यकालीन संगीत परंपरा के संस्थापक अमीर खुसरों को सितार और तबले के आविष्कार का जनक माना जाता है। उसने ही भारतीय संगीत में कव्वाली गायन को प्रचालित किया। प्रचलित ख्याल गायकी के आविष्कार का श्रेय जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह शर्की को दिया जाता है। रबाब, सारंगी, सितार और तबला इस काल के मशहुर वाद्ययंत्र थे। फिरोज तुगलक के बारे में जानकारी मिलती है कि जब वह गद्दी पर बैठा तो 21 दिनों तक संगीत गोष्ठी का आयोजन किया। क्या ये सभी उदाहरण इस बात के गवाह नहीं हैं कि संगीत इस्लाम का एक अभिन्न अंग रहा है? संगीत को गैर इस्लामिक बताने वाले मुफ्तियों और कट्टरपंथियों को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या सल्तनतकालीन सुल्तान मुसलमान नहीं थे? अगर उस समय संगीत गैर इस्लामिक नहीं था तो आज कैसे हो गया? मुगलकालीन शासक अकबर के दरबार में तानसेन जैसे प्रसिद्ध संगीतज्ञ को संरक्षण हासिल था। अबुल फजल ने तानसेन के बारे में लिखा है कि उसके जैसा गायक हजार वर्षों में कभी नहीं हुआ। मियां की टोड़ी, मियां की मल्हार, मियां की सारंग, दरबारी कान्हड़ी तानसेन की प्रमुख रचनाएं हैं। अकबर के समय में ध्रुपद गायन शैली एवं वीणा का प्रचार हुआ। अबुल ने अकबर के दरबार में 36 गायकों का उल्लेख किया है। तानसेन का पुत्र विलास खां जहांगीर के दरबार का प्रमुख संगीतज्ञ था। शाहजहां अपने दीवने खास में प्रतिदिन गीत-संगीत सुना करता था। क्या मुगलकालीन शासक मुसलमान नहीं थे? या उनकी इस्लाम में आस्था नहीं थी? सच तो यह है कि गीत-संगीत इस्लाम की शानदार परंपरा का हिस्सा रहा है। सूफी संतों ने संगीत से रुहानी ताकत हासिल की। शेख मुईनुद्दीन चिश्ती संगीत को आत्मा का पौष्टिक आहार कहा है।

 

अबुल फजल ने आईने अकबरी में 14 सूफी सिलसिले का उल्लेख किया है। सुहरावर्दिया शाखा में शेख मूसा एक महत्वपूर्ण सूफी संत हुए जो सदैव स्त्री के वेष में रहते हुए नृत्य और संगीत में अपना समय व्यतीत करते थे। सूफी संत ईश्वर को प्रियतमा एवं स्वयं को प्रियतम मानते थे। उनका विश्वास था कि ईश्वर की प्राप्ति गीत-संगीत से ही की जा सकती है। याद होगा गत वर्ष पहले कश्मीर के मुफ्ती-ए-आजम ने वाद्ययंत्र गिटार को लेकर सवाल खड़ा किया था। उन्होंने इसे यूरोपियन साज बता गैर इस्लामिक कहा। लेकिन यहां समझना जरुरी है कि कव्वाली में जिस हारमोनियम का उपयोग होता है वह भी यूरोपियन साज ही है। लेकिन उसे लेकर कभी सवाल खड़ा नहीं हुआ। आखिर क्यों? समझना कठिन है कि कट्टरपंथी संगठन और मुफ्ती-मौलाना संगीत और वाद्ययंत्रों के खिलाफ फतवा जारी कर इस्लाम को मकबूल कर रहे हैं या उसकी छवि को धुल-धुसरित कर रहे हैं। उचित होता कि मुफ्ती और इस्लामिक बुद्धिजीवी उन लोगों के खिलाफ फतवा जारी करते जो इस्लाम के नाम पर दहशतगर्दी परोस रहे हैं। उनके खिलाफ फतवा जारी करते जो कश्मीर में जहर बो रहे हैं। वे ऐसे लोगों के खिलाफ क्यों हैं जो संगीत के माध्यम से मानवता के बीच प्रेम बांट रहे हैं? उनके खिलाफ क्यों हैं जो इसे अपना प्रोफेसन बनाना चाहते हैं? लेकिन यहां ध्यान देना होगा कि संगीत पर पहरेदारी के लिए सिर्फ कट्टरपंथी संगठन ही एकमात्र जिम्मेदार नहीं है। इसके लिए मुस्लिम समाज भी जिम्मेदार है। अच्छा होता कि मुस्लिम समाज इन कट्टरपंथी संगठनों के खिलाफ तनकर खड़ा होता और मुंहतोड़ जवाब देता। लेकिन उसकी चुप्पी हैरान करने वाली है। यह कम खौफनाक नहीं है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश में जहां संविधान ने सभी नागरिकों को समान अधिकार दिया है और किसी के साथ भी जाति, धर्म, पंथ, मजहब तथा लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता, के बावजूद भी कुछ कट्टरपंथी मजहबी संगठन पढ़ी-लिखी मुस्लिम छात्राओं को अपने हुनर के मुताबिक प्रोफेशन चुनने से डरा रहे हैं। ऐसे में सरकार का दायित्व बनता है कि ऐसे मजहबी संगठनों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करे। अन्यथा देश की धर्मनिरपेक्षता को क्षति पहुंचेगी और लोकतंत्र लहूलुहान होगा। यह कतई उचित नहीं होगा कि मजहबी संगठन शरिया की आड़ में फतवा जारी कर मुस्लिम महिलाओं के बुनियादी अधिकारों के साथ खिलवाड़ करें। आश्चर्य की बात यह है कि धर्मनिरपेक्षता की ठेका उठा रखे कुछ प्रपंची किस्म के सियासतदान इस मसले पर अपनी आंख-कान बंद किए हैं। वे इसे मुस्लिम समाज का अंदरुनी मामला बताकर नाहिद अफरीन के पक्ष में खड़ा होने से बच रहे हैं। इसी शुतुर्गमुर्गी रवैए का नतीजा है कि आज कठमुल्लों का हौसला बुलंद है और वे तुगलकी फतवे के जरिए इस्लाम की उदार विचारधारा को लहूलुहान कर रहे हैं।

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