सपा को चाहिए लोहिया का दिमाग/ – अरूण कुमार त्रिपाठी

वर्तमान के गड्डे में गिरी समाजवादी पार्टी का भविष्य तभी उज्जवल है, जब उसे बेहद उर्वर मस्तिष्क और उज्ज्वल चरित्र वाला जुझारू नेतृत्व मिले ताकि दूसरे परम्परा को जीवित कर सके। यह नेतृत्व आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण और डाॅ.राम मनोहर लोहिया की विचारधारा को नया अर्थ प्रदान करें, आज संदर्भ में उनकी नई व्याख्या करें और उन्हेुं लागू करने के लिए रचना और संघर्ष के नये कार्यक्रम कराए। सपा के रजत जयंती वर्ष में उसे मिली भयानक पराजय है, लेकिन उसे नहीं भूलना चाहिए कि इस देश में समाजवादी आंदोलन की शानदार विरासत है। विरासत को पहचानने का काम आसान नहीं है, लेकिन इसके अलावा कोई सरल रास्ता भी तो नहीं है। वहाँ तक पहुंचने के लिए पहले तो समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव को अपने संगठन और परिवार में पराजय के बाद उभरी ईष्र्या और हताशा से निपटना होगा। फिर नई कार्ययोजनाओं पर काम करना होगा। 2017 के जनवरी महीने में अखिलेश यादव ने जिस पीढ़ीगत परिवर्तन को अंजाम दिया था, उसे मजबूती देने के लिए ठोस रास्ता तैयार करना होगा वरना उस परिवर्तन के भी पटरी से उतर जाने का खतरा है।
समाजवादी पार्टी का 224 सीटों से 48 सीटों पर सिमट जाना न सिर्फ उसके शासन के रिकार्ड को खारिज करने वाली टिप्पणी है, उसकी विचारधारा पर भी गहरी टिप्पणी है। इस चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डाॅ.राम मनोहर लोहिया का नाम कई बार लिया और उनके माध्यम से जातिवादी राजनीति की आलोचना की। उनका मकसद उन तमाम पिछड़ी जातियों को अपनी ओर आकर्षित करना था, जो समाजवादी पार्टी में सम्मान और सत्ता नहीं पा सकी हैं। इस तरह उन्होंने राजनीतिक हो चुकी जातियों को उन जातियों के साथ जोड़ने का प्रयोग भी किया, जिनके विरूद्ध पिछड़ी दलित जातियों ने अपना राजनीतिकरण किया था। इस काम के पीछे अन्याय और पिछड़ेपन का वह गहरा विमर्श था, जिसे संघ्ज्ञ परिवार और भारतीय जनता पार्टी ने लंबे समय से चला रखा है। वह उनका ठीकरा न तो ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर फोड़ती है, और न किसी आर्थिक व्यवस्था पर। वह इनका दोष कांग्रेस और उसके बाद पैदा हुई गैर कांग्रेसवादी सेक्युलर राजनीति पर थोपती है।

सपा करे मंथन:- ऐसे में समाजवादी पार्टी को अपने भविष्य के लिए समझना होगा कि वह नए समाज और नई राजनीति के लिए कौन सा सपना देखती है और उस सपने के रास्ते में सबसे बड़ी रूकावट कौन सी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था है। मगर समाजवादी पार्टी मानती है कि उसे एक समतामूलक समाज का निर्माण करना है, जिसमें जातिवाद, आर्थिक गैर बराबरी और सांप्रदायिकता न हो तो उसे उसके लिए आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर रणनीति बनानी होगी यह एक बड़ा काम है, और यह न तो प्रशान्त किशोर जैसे चुनावबाज बुद्धिजीवियों से होगा और न तो नवनीत सहगल जैसे प्रचारबाज अफसरों से। इसके लिए शिक्षा और संस्कृति को लक्ष्य करके दीर्घकालिक योजना का निर्माण करना होगा। उस काम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों से प्रेरणा लेनी होगी। नए संगठन बनाने होंगे और राष्ट्र संवा दल जैसे उन तमाम संगठनों को सक्रिय करना होगा जिनसे निकल कर समाजवादी आंदोलन का कैडर तैयार होता रहा है।
डाॅ.राम मनोहर लोहिया ने अगर ‘पिछड़ा पावें सौ से साठ’ का नारा लगाया तो उसके पीछे उनका मकसद जाति व्यवस्था को तोड़ना था, न कि उसे नए रूप में पुनरूज्जीवित करना था। पिछले तीस वर्षों से उत्तर प्रदेश में पिछड़ा और दलित राजनीति में जो उभर आया है, उसका एक लक्ष्य जाति व्यवस्था को ढ़ीला करना था। लेकिन सत्ता पाने के लिए इन आंदोलनों की अगुवाई करने वाली जातियों ने जो समीकरण बनाया वह नये किस्म के जातिवाद का पोषक हो गया। समाजवादी पार्टी को किसी बड़े लक्ष्य को प्राप्त करना है, तो उसे सामाजिक रूप से जाति तोड़ने के रेडिकल विमर्श को पुनरूज्जीवित करना होगा। उस विमर्श में डाॅ. भीम राव अंबेडकर के चिंतन को भी शामिल करना होगा। समाजवादी पार्टी को याद रखना होगा कि इस देश की जाति व्यवस्था को तोड़ने के लिए लोहिया, रामास्वामी नाइकर से मिलने मद्रास गए थे, और दिल्ली से अंबेडकर से राजनीति गठजोड़ बनाने के लिए अपने प्रतिनिधि भेजे थे। समाजवादी पार्टी को अपना, भविष्य बनाना है, तो उसे भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के समक्ष जातिव्यवस्था को तोड़ने का क्रांतिकारी आदर्श उपस्थित करना होगा, क्योंकि भाजपा ने सवर्ण जातियों के मजबूत समर्थन से गैर- यादव पिछड़ी और गैर-जाटव दलित जातियों का जो गठजोड़ बनाया है, उसके पीछे जाति व्यवस्था को तोड़ने का इरादा नहीं है। सपा जाति व्यवस्था के उन्मूलन के आदर्श की बड़ी लकीर खींचकर उससे आगे जा सकती है। यह काम 1993 में मुलायम और काशीराम के ऐतिहासिक गठजोड़ को सामाजिक स्तर पर उतारने जैसा होगा। ध्यान रहे कि संघ परिवार ने इस गठबंधन को इसी प्रचार के साथ तोड़ा था कि पिछड़ों और दलितों का गठबंधन चल नहीं सकता क्योंके दलितों पर अत्याचार तो पिछड़ी जातियाँ ही करती हैं।

बिहार प्रयोगः- उसे आगे जाकर सपा को एक ऐसा राजनीतिक गठबंधन बनाना होगा जो 2015 में हुए बिहार के चुनावी समीकरण का विस्तार हो। सपा ने इस दिशा में कांग्रेस से गठबंधन करके जो राजनीतिक कदम बढ़ाया है, उस पपर पछतावा न करके उसे नया रूप देने की आवश्यकता है। इस गठबंधन में बसपा और कम्युनिष्टों को भी शामिल करने के साथ अन्य क्षेत्रीय दलों को लाने का प्रयास होना चाहिए। यह प्रयास एनटी रामाराव के नेतृत्व में बने नेशनल फ्रांट की पुनरावृत्ति हो सकता है, या लोहिया के उस नारे का नये अर्थोंमें विस्तार भी हो सकता है कि कांग्रेस को हराने के लिए शैतान से हाथ मिला सकता हूँ। आज सपा के उत्तर प्रदेश में अपना भविष्य बनाना है, और अपने रजत जयंती वर्ष पर मिली धनघोर पराजय को विजय में बदलना है तो गैर-भाजपावाद के सिद्धान्त और नारे को अपनाना ही होगा। इस राजनीतिक गठबंधन में सपा को उन नये प्रयोगों की ओर ध्यान देना होगा जो 2010 में अन्ना आंदोलन के समय जनलोकपाल और नये लोकतांत्रीकरण की मांग के साथ उभर रहें थे, लेकिन दिल्ली में आप की सत्ता आने के साथ बिखर गये।

सपा के उत्थान के लिए तीसरा कार्यक्रम आर्थिक होगा। उसे बताना होेगा कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक व्यवस्था लड़खड़ा रही है, और मोदी उसी प्रतिनिधि के तौर पर राष्ट्रवाद का नारा लगाकर उसे बचाने में लगे हैं। आज दुनिया में नये किस्म की उत्पादन-वितरण-प्रणाली चाहिए जिसमें गांधी, लोहिया और अंबेडकर का अर्थिक दर्शन काफी कुछ योगदान दे सकता है। संयोग से अंबेडकर की 125वीं जयन्ती से 2019 तक गांधी की डेढ़ सौवीं जयन्ती के इस दौर को कांग्रेस, सपा और बसपा बेहद रचनात्मक आख्यान के रूप में उपस्थित कर सकती है। तब उन्हें ‘कसाब’ कहने वाला जनता की नजरों में उठने के बजाय गिर जायेगा।

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