हिन्दुत्व और विकास का एजेण्डा एक दूसरे के पूरक/- राजनाथ सिंह ‘सूर्य’

योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का ममुख्यमंत्री बनाये जाने पर अनेक बुद्धिजीवियों, कांग्रेस सहित तमाम राजनीतिक दलों और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया ने एक ही प्रश्न उभारा- भारतीय जनता पार्टी क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सबका साथ सबका विकास के एजेण्डे पर चलेगी अथवा हिन्दुत्व के। विशेषज्ञ और समझदार होने का जिन लोगों ने तमगा पहन रखे हैं, उनके अनुसार हिन्दुत्व विकास विरोधी साम्प्रदायिक अभिव्यक्ति है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डाॅ. केशव बलिराम हेडगेवार ने हिन्दुत्व की राष्ट्रीयतव है। की, अभिव्यक्ति को मुखरित कर स्वामी विवेकानन्द के गर्व से कहो हम हिन्दु हैं, की प्रतिध्वनि की थी। पिछली दो शताब्दी में हमारे जितने भी समाज सुधारक हुए जिनमें स्वामी दयानन्द सरस्वती का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। उन्होंने भारतीयों को उनकी सांस्कृतिक अवधारणा से साक्षात्कार ही कराने का प्रयास किया। इस्लामिक आस्था और ब्रिटिश सत्ता के शासकों के प्रभाव में एक हजार वर्ष से अधिक रहने के कारण हम अपनी मूलभूत अवधारणाओं से कट गए थे। हम यह समझाने वालों को सफलता मिली कि हिन्दु की पहचार उसी प्रकार सम्प्रदाय के रूप में है, जैसा इस्लाम और ईसाइयत की। इसी अवधारणा के चलते हमने अंगे्रजी में लिखे गये भारतीय संविधान का हिन्दी अनुवाद करते समय अंग्रेजी के शब्द सेक्युलर, धर्मनिरपेक्षता के रूप में अनुवाद किया। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में इस गलती को सुधार कर धर्म निरपेक्ष के स्थान पर पंथ निरपेक्ष शब्द का प्रयोेग किया गया, जो राज्य करने वाले की अपनी उपासना आस्था का आग्रह शासन की नीति नहीं बनाता। धर्मशब्द का प्रयोग भारत में कर्तव्य के पर्याय के रूप किया गया है। इसलिए जो भी राजा होता था वह धर्मदंड का संज्ञान रखने के कारण अपने को सत्ता का ट्रस्टी समझता था जिस किसी ने इस अवधारणा की उपेक्षा किया, और सत्ता को निजी सुख भोग का सााधन बना लिया उसे राक्षस की संज्ञा प्रदान किया गया। ऐसे राक्षसों की एक लम्बी फेहरिस्त है। हमारे आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता संभालने वालों में ट्रस्टीशिप की भावना उत्तरोत्तर तिरोहित होती गयी। तथा सत्ता को निजी सम्पत्ति समझकर अपनी सम्पन्नता बढ़ाने और जाति सम्प्रदाय का हित विल्तन से नीचे उतरकर कुनबा परस्ती पर उतर आये। राक्षसों के समान ही वे अहंकार से वशीभूत होकर शोषणकर्ता के रूप में पहचान बनाने के कारण नष्ट भी होते रहे हैं। हिन्दुत्व या भारतीयत्व, समदर्शी और अपरिग्रह का पर्याय भी हैं। इसीलिए बार-बार हमारे विचारों ने कहा है त्वदीपयं वस्तु गोविन्दम्त्वेव समर्पयाम।
भारतीय पुर्नजागरण अपने अतीत और सांस्कृतिक की अनुभूति कराने के लिए प्रारंभ हुआ था। इस उद्देश्य से वह अवधारणा किसी वर्गीय या संकुचित सोच से नहीं पनपी थी। भारतीयत्व या हिन्दुत्व की अवधारणा हमारी ऋषि परम्परा उद्धत अनुभूति सर्वेभवन्तु सुखिना पर आधारित है। सभी के सुख की कामना न तो साम्प्रदायिक है और न कुनबापरस्त। हमारे प्रत्येक विचारक ने इस जगत में जो कुछ है, वह ईश्वर की निर्मित है, मानकर सबके साथ, तादात्म का संदेश दिया है। हिन्दुत्व की अवधारणा इस तादात्म पर आधारित भावना है जिसका विलुप्ति हम पर वाह्य अवधारणा की सत्ताई प्रभाव से हो गई है। संघ ने इसी अनुभूति पर पड़ी राख को हराने के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का अभियान डाॅ. हेडगेवार ने शुरू किया था, जो आज विश्वव्यापी हो चला है तथा सुख और शांति के लिए प्रकृति से तादात्म के रूप में आध्यात्मिक अनुभूति करा रहा है। इसलिए हिन्दुत्व उनके लिए विकास विरोधी हो सकता है जो इस अवधारणा को मजहबी संकुचितता के साथ देखते हैं। उनकी समझ को सही करने के लिए हिन्दुत्व की राष्ट्रीयत्व है या राष्ट्र प्रथम की अनुभूति कराने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज की भाषा में इंडिया फस्र्ट, की शब्दावलि का प्रयोग करते हुए सबका साथ और सबका विकास का आधार बनाया है। इसलिए हिन्दुत्व अर्थात राष्ट्रीयत्व की अवधारणा और सबका साथ सबका विकास परस्पर विरोधी अवधारणा नहीं अपितु एक दूसरे के पूरक हैं। हिन्दुत्व को संकुचित समझने वाले उसके निहित सर्वेभवन्तु सुखिना की अनुभूति से या तो अनभिज्ञ हैं प्रचीनकालीन उस राक्षसी प्रवृत्ति से वशीभूत है जो सोने की लंका बनाकर स्वयं और अधिक से अधिक कुनबे को शामिल कर ऐश करना चाहते हैं। उनको नरेन्द्र मोदी का उद्घोषणा न खाऊंगा खाने दूंगा और अब न बैठूंगा न बैठने दूंगा हास परिहास का विषय बनाने को मानसिकता भले ही प्रदान करता हो, देश का जनमानस को ट्रस्टीशिप की संस्कारित संस्कृति का आग्रही है, अभी भूत है उनकी और उनके उन्मुख होने का वही कारण है। एक ग्रामीण ने इसी अनुभूति को यह कहकर अभिव्यक्ति किया कि मोदी का अपना कोई तो परिवार है नहीं जिसके लिए बेईमानी करेंगे। वह जो कुछ कर रहे हैं हमारे लिए ही तो कर रहे हैं। वर्षों बाद देश के आवाम में यह विश्वास पैदा हुआ है कि सत्ता स्वयं की सम्पन्नता या कुनबे की विलासित की लीक से हटी है और सबका साथ-सबका विकास की सार्थक अवधारणामुक्त राजपथ पर आ गई है।
योगी आदित्यनाथ एक संन्यासी हैं और गोरक्षपीठ के अधीक्षक। हमारे यहां आम कहावत है जाति न पूछो साधु की। योगी ने जन्म भले ही किसी जाति में लिया हो, लेकिन सन्यासी बनने के बाद किसी जाति के नहीं रहे। वे जिस पीठ की अधीश्वर हैं वहां जाति सम्प्रदाय की कोई पहचान नहीं है। सबकी समानता पर आधारित गोरक्षपीठ यद्यपि प्रारत्भ से ही सामाजिक समरसता व राष्ट्रीय चेतना जागरण के अभियान और शिक्षा के प्रसार में लगी रही है। तथापि योगी आदित्यनाथ ने सन्यासी बनने के साथ उसे तीव्र प्रगति प्रदान किया है। औपचारिक रूप से मठ के अधीक्षक का दायित्व संभालने में पूर्व वे दायित्व निभाने में इतने तन्मय रहे हैं कि उनके गुरू ब्रह्मलीन अवैधनाथ की उसका उल्लेख करते समय इतने भावुक हो जाते थे, कि उनकी आँखों में आँसू आ जाते थे, कंठ अवरूद्ध हो जाता है। पांच बार लगातार और पहले से अधिक समर्थन के साथ आदित्यनाथ क्यों इतने लोकप्रिय हैं यह वही समझ सकता है जिसने उनकी सर्वग्राही कार्यशैली और अथक परिश्रम को देखा है। प्रातःकालीन तीन बजे से प्रारम्भ दिनचर्या रात्रि बारह बजे समाप्त होती है, इस बीच में भी यदि कहीं किसी अनहोनी घटना की सूचना आती तो प्रशासन तंत्र में पहुंचने के पूर्व वे पहुंच जाते हैं। उनके प्रातःकाल के अनभेंट के बडी संख्या अपनी समस्रूा के समाधान लिए उपस्थित होने वालोें में मुस्लिम महिलाएं ही ज्यादा होती है।
योगी आदित्यनाथ उग्र नहीं प्रखर हिन्दुवादी हैं। वे स्पष्टवादी हैं। इस स्पष्टवादिता को जो सही परिप्रेक्ष्य मंे नहीं समझता वही उन्हें किसी सम्प्रदाय का शत्रु मानता है। उन्हें देश विरोधी गतिविधि वर्दाश्त नहीं है। इस बारे में उनकी प्रखर भावना को अंदेशे के रूप में देखने से वे ही भ्रमित है। जिनको राष्ट्रवाद की भावना सर्वग्रही नहीं संकुचित मालूम पड़ती है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित होने के बाद और उसके पूर्व गुजरात का मुख्यमंत्री रहने पर जिस प्रकार की कुत्सित अभियान भारत और विश्व के अनेक देशों में चलाया गया, वह सब उनके इंडिया फस्र्ट, सबका साथ सबका विकास के लिए किए जा रहे अहर्निश प्रयास से धूमिल पड़ता जा रहा है। योगी आदित्यनाथ को देश के सबसे बड़े प्रदेश की सत्ता संचालन की बागडोर सौंपे जाने पर जो भय दोहनवादी, अनेक प्रकार के मुखौटों के साथ राजनीतिक रंगमंच पर उछल कूद करते रहे हैं। ये भयभीत होकर हिन्दुत्व या राष्ट्रवाद को सबका साथ- सबका विकास विरोधी समझाते होंगे, लेकिन जो सनातन भारतीयता सर्वेभवन्ति सुखिना और सत्ता संचालन में ट्रस्टीशिप की अवधारणामुक्त हैं, उनके लिए योगी का मुख्यमंत्री बनना एक सुखद अनुभूति है। दो वर्ष में जैसे मोदी को संकुचित सोच कर समझ फैलाने वाले निःशब्द हो गये हैं वही स्थिति योगी के बारे में अवधारणा रचखे वालों की भी होगी। हिदुत्व की अवधारणा और विकास का प्रयास दोनों को निजी स्वार्थरहित अवधारणा होने के कारण एक दूसरे के पूरक हैं।

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