ग़ज़ल के नायक दुष्यंत कुमार

शार्प रिपोर्टर डॉट इन

दुष्यंत कुमार का जन्म उत्तर प्रदेश में जनपद बिजनौर के ग्राम राजपुर नवादा के जमींदार परिवार में 1 सितम्बर 1933 को हुआ था। आपकी माता जी का नाम श्रीमती राम किशोरी देवी एवं पिता का नाम चैधरी भगवत सहाय था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की ही पाठशाला में हुई। 1948 में कवि ने एस.एन.एस.एम. हाई स्कूल नहटौर जनपद बिजनौर से दसवीं कक्षा पास कर 1950 में चंदौसी, मुरादाबाद के एस.एम. काॅलेज से इंटरमिडिएट किया। 1950-54 तक कवि ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय का छात्र रहते हुए बी.ए. और हिंदी साहित्य से एम.ए. किया। 1957-58 में कवि ने मुरादाबाद से बी.एड. किया। चंदौसी में 30 नवंबर 1949 को राजेश्वरी कौशिक से कवि का विवाह संपन्न हुआ। कवि ने सर्व प्रथम जनपद बिजनौर के क़सबे किरतफर में नौकरी। कवि ने यहाँ एक विद्यालय में अध्यापकी की। यहाँ अध्यापकी करने के बाद ही मुरादाबाद से बी.एड. किया। तत्पश्चात आकाशवाणी दिल्ली के हिंदी वार्ता-विभाग में स्क्रिप्ट राइटर के रूप में कार्य किया। 1960 के अंतिम दिनों में कवि स्थानांतरण पाकर भोपाल पहुँचे। कवि ने मध्य प्रदेश के संस्कृत संचालनालय के अंतर्गत भाषा-विभाग के सहायक संचालक पद पर नियुक्ति पाई। कवि ने कुछ समय के लिए आदिम जाति जनकल्याण विभाग की प्रतिनयिुक्तियों के अतिरिक्त शेष समय 30 दिसंबर 1975 तक इसी भाषा-विभाग में बिताया। कवि ने नहटौर में शिक्षा प्राप्ति के समय ही रचनाधर्मिता का निर्वाह प्रारंभ कर दिया था। यहाँ कवि ने विधिवत कविता-लेखन, कविता की पाण्डुलिपि तैयार कर चंदौसी में शिक्षा के दौरान अंतिम रूप दिया। संर्पण था छायावादी कवि सुमित्रनंदन पंत को। कवि ने पंत को द्रोणाचार्य और स्वयं को एकलव्य माना। कवि ने अपना उप नाम ‘परदेशी’ रखा। विवाह के समय निमंत्रण-पत्र पर भी दुष्यंत कुमार त्यागी ‘परदेशी’ छपवाया गया। जब कवि उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद पहुँचे तब वहाँ उन्हें कमलेश्वर और मार्कंडेय जैसे अभिन्न मित्र मिले। तिकड़ी बनी तो ‘त्रिशूल’ नाम से प्रसिद्धि प्राप्त होते देर नहीं लगी। यहीं से तीनों ने मिलकर मासिक पत्रिका ‘विहान’ का प्रकाशन प्रारंभ किया।

दुष्यंत कुमार के लेखन का प्रारंभ 1945 से ही हो गया था। प्रारंभ कविता से किया और बाद में कहानी भी लिखने लगे। प्रारंभ में कवि-सम्मेलनों के लिए मंचीय कविताएं लिखीं परंतु शीघ्र ही साहित्यिक गीतों और कभी-कभी ग़ज़ल की रचना भी करने लगे। 1949 में कविताओं की पांडुलिपि तैयार हो गयी थी। 1954-55 में हैदराबाद से प्रकाशित ‘कल्पना’ पत्रिका (जनवरी 1955) में नई कहानी: परंपरा और प्रयोग’ शीर्षक ऐतिहासिक आलोचना का प्रकाशन हुआ। 1956-57 में ‘सूर्य का स्वागत’ नामक शीर्षक से कविताओं का संचयन और प्रकाशन हुआ। इससे पहले अनेक पत्र-पत्रिकाओं-प्रतीक, निकष, संकेत, नई कविता आदि में प्रकाशन हो चुका था। ‘आवाजों़ के घेरे’ (कविता संग्रह) 1963 में प्रकाशित हुई। 1964 में ‘एक कंठ विषपायी’ (काव्य-नाटक) प्रकाशित हुआ। ‘छोटे-छोटे सवाल’ 1964 में और ‘आंगन में एक वृक्ष’ 1970 में शीर्षक से उपन्यास प्रकाशित हुए। 1973 में कविताओं का तीसरा संग्रह ‘जलते हुए वन का वसन्त’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। अंतिम किंतु सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त करने वाली कृति ‘साये में धूप’ रही। 1975 में ऐतिहासिक ग़ज़ल संग्रह ‘साये में धूप’ नाम से प्रकाशित किया गया।
व्यक्तिगत रूप में मैं इन अभिनंदनों के खि़लाफ़ हूँ। एक तो इसलिए कि लेखक को अपनी पीठ पर भरसक कोई ऐसा अहसास नहीं लादना चाहिए जो उसकी स्वतंत्रता में बाधक बने, और दूसरे इसलिए कि इससे लेखक को एक वर्ग के रूप में दूसरे वर्गों पर तरजीह मिलती है जो कि एक ग़लत बात है। आखि़र क्यों शासन उस क्लर्क का अभिनंदन न करे जिसने अपने जीवन के तीस अमूल्य वर्ष बड़ी निष्ठापूर्वक उन फाइलों में झौंक दिए जिनसे कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं था। इसी प्रकार सुनार, बढ़ई, मोची, मज़दूर और मेहतर, हरेक की अपनी एक महत्त्वपूण सामाजिक भूमिका है। आखि़र उनका अभिनंदन क्यों नहीं होता? फिर लेखक में ऐसे कौन-से सुर्ख़ाब के पर लगे हैं कि आम आदमी से अलग है? क्यों वह शासकीय और सार्वजनिक सम्मान की कल्पना करता है? क्यों वह राज्यपालों या मंत्रियों की परिचय परिधि में आना चाहता है? (मैंने तो किसी राज्यपाल को किसी लेखक के सान्निध्य की इच्छा करते हुए नहीं देखा) क्यों वह चाहता है कि सत्ताधारी उसकी लेखनी से परिचित हों और उससे सामान्य लोगों की अपेक्षा भिन्न प्रकार का व्यवहार करें? आखिर लेखक भी तो तो प्रोफे़सर, वकील, चित्रकार और मूर्तिकार आदि की तरह ही एक वर्ग है और इस व्यावसायिक युग में उन्हीं की तरह अपने ढंग से अपना पेट पालता है। अलबत्ता उसे यह अतिरिक्त सुविधा ज़रूर प्राप्त है कि वह अपने थोथे और घटिया से घटिया अहम् को भी शानदार अभिव्यक्ति दे सकता है। पिटकर आने के बाद वह जोशीली कविताएँ लिख सकता है या अपने पौरूष और बल का बखान कर सकता है। सर्वत्र उपेक्षा सहकर भी वह शिमला समझौते में मेरा विनम्र योगदान’ जैसा निबंध लिख सकता है या डाकुओं के संर्पण का श्रेय अपनी कल्पना में लूट सकता है। वह एक लेख में दस बार अपना नाम ठँूस सकता है और उस बनिए की ख़बर भी ले सकता है जो उसके घर रोज़ पैसों का तकाज़ा करने आता है। आप लेखक के नाते अपने ‘मैं’ को झुनझुने की तरह बजाते हैं, मित्रें की प्रशंसा और शत्रुओं की निंदा करते हैं, साहित्य के नाम पर दिल की भड़ास निकालते हैं, मित्रें की प्रशंसा और शत्रुओं की निंदा करते हैं, साहित्य के नाम पर दिल की भड़ास निकालते हैं औ यह भी आशा करते हैं कि दुनिया आपको पूजे, लोग आपको चाहें, शासन आपको मान्यता दे।

दुष्यंत कुमार कृत साये में धूप (ग़ज़ल संग्रह)
भूमिका भाग में दुष्यंत स्वीकारतेे हैं-
मैं स्वीकार करता हूँ – कि ग़ज़लों को भूमिका की जरूरत नहीं होनी चाहिए, लेकिन एक कैफ़ियत इनकी भाषा के बारे में जरूरी है। कुछ उर्दू-दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज किया है। उनका कहना है कि शब्द ”शहर“ नहीं ‘शह्र’ होता है, ‘वज़न’ नहीं ‘वज़्न’ होता है।
– कि मैं उर्दू नहीं जानता लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझकर किया गया है। यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि ‘शहर’ की जगह ‘नगर’ लिखकर इस दोष से मुक्ति पा लूँ, किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है, जिस रूप में में वे हिंदी में घुल मिल गए हैं। उर्दू का ‘शहन’ हिंदी में ‘शहर’ लिखा और बोला जाता है; ठीक उसी तरह जैसे हिंदी का ‘ब्राह्मण’ उर्दू में ‘बिरहमन’ हो गया है और ‘ऋतु’ ‘रुत’ हो गई है।
– कि उर्दू और हिंदी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के पास आती हैं तो उनमें फ़र्क कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नीयत और कोशिश यह रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज़्यादा से ज़्यादा करीब ला सकूँ। इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में कही गई हैं, जिस मैं बोलता हूँ।
– कि ग़ज़ल कि विधा एक बहुत फरानी, किंतु सशक्त विधा है, जिसमें बड़े-बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य-रचना की है। हिंदी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नए कवियों तक अनेक कवियों ने इस विधा को आजमाया है। परंतु अपनी सामथ्र्य और सीमाओं को जानने के बावजूद इस विधा में उतरते हुए मुझे आज भी संकोच तो है, पर उतना नहीं जितना होना चाहिए था। शायद इसका कारण यह है कि पत्र-पत्रिकाओं में इस संग्रह की कुछ ग़ज़लें पढ़कर और सुनकर विभिन्न वादों, रूचियों और वर्गों की सृजनशील प्रतिभाओं ने अपने पत्रें मंतव्यों एवं टिप्पणियों से मुझे एक सुखद आत्म-विश्वास दिया है। इस नाते मैं उन सबका अत्यंत आभारी हूँ।
….. और कमलेश्वर! वह इस अफ़सानें में न होता तो ये सिलसिला शायद यहाँ तक न आ पाता। मैं तो-
हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।

हिंदी में आधुनिक ग़ज़ल का सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण नाम दुष्यंत ही है। यह सही है, दुष्यंत के बाद हिंदी-ग़ज़ल काफ़ी आगे बढ़ी, कला और अभिव्यक्ति दोनों स्तरों पर इसका उल्लेखनीय विकास हुआ, किंतु जो ख्याति एवं लोकप्रियता दुष्यंत को प्राप्त हुई, वह तो अद्वितिय ही है। हिंदी में ग़ज़लकारों ने अच्छे से अच्छा लिखने का प्रयास किया, किंतु कोई भी दुष्यंत को छू नहीं सका है। सच यही है कि दुष्यंत पहले ऐसे ग़ज़लकार हैं, जिन्होंने ग़ज़ल को हिंदी में स्थापित करने का सफल प्रयास किया। इस प्रकार कहा जा सकता है हिक ग़ज़ल की लोकप्रियता का प्रारंभ दुष्यंत ने ही किया। हिंदी साहित्य में आज ग़ज़ल की चमक है। निरंतर ग़ज़ल-संग्रह छप रहे हैं। पत्र-पत्रिकाओं में ग़ज़ल खूब नज़र आ रही है। कवि-सम्मेलनों में ग़ज़ल ने धूम मचा रखी है। ‘‘इस अपार लोकप्रियता के मूल कारणों की खोज की जाए तो दुष्यंत का नाम और काम अवश्य नज़र आएगा। लेकिन वे कौन-से कारण हैं, जिनके रहते दुष्यंत एक ग़ज़लकार के रूप में स्वयं को स्थापित कर सके और लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचकर ग़ज़ल-सम्राट की उपाधि से सम्मानित हो सके। वस्तुतः दुष्यंत ने एक ओर तो ग़ज़ल को अपने युग की धड़कनों से जोड़ा तो दूसरी ओर उसे अभिव्यक्ति की वह नवीनता दी, जो हिंदी के लिए नितांत चैंका देने वाली थी। साहित्य में अंदाजे़-बयाँ या बात कहने की व्यक्तिगत शैली, अभिव्यक्ति का अनोखा और निराला ढंग जो चमत्कार कर दिखाता है, वह केवल शब्दों के द्वारा संभव नहीं होता। क्योंकि शब्द तो प्रायः वही होते हैं, जिनका प्रयोग अपने-अपने ढंग से हर साहित्यकार करता है, किंतु क़लम का धनी कलाकार इन शब्दों के प्रयोग का एक नया और सबसे अनोखा अंदाज़ ग्रहण करता है और उन पर अपने कलात्मक व्यक्तित्व की गहरी छाप छोड़ जाता है और इस प्रकार वह स्वयं अपने-आपको और अपने साहित्य दोनों को अमर कर जाता है। नवीनता शब्दों में नहीं, शब्दों के प्रयोग करने के ढंग में होती है, सोच में और विचार में होती है। दुष्यंत के काव्य में शब्दों के प्रयोग और सोच दोनों ही में असाधारण नवीनता थी, इसलिए उनकी आवाज़ ने हिंदी के विशाल क्षेत्र में फैले हुए अनगिनत पाठकों को चैंकाया और प्रभावित किया।’’

‘‘यह सही है कि हिंदी के सर्वप्रथम स्थापित ग़ज़लकार दुष्यंत की ग़ज़लों में व्याकरण-संबधी कुछ दोष अवश्य हैं, फिर भी दुष्यंत के महत्त्व और महानता में कोई कमी नहीं आ सकती। ग़ज़ल के प्रारंभिक दौर में वह न होते, कोई और होता, तब भी इस तरह के दोष का रह जाना संभव था, क्योंकि तब तक न तो हिंदीभाषी ग़ज़ल की संस्कृति से पूरी तरह जुड़ पाए थे, न उन्हें ग़ज़ल की परिपूर्ण जानकारी ही थी। ऐसी स्थिति में दुष्यंत ने जो कार्य कर दिखाया, वह महत्वपूण है। यद्यपि आज भी हिंदी-ग़ज़लकारों को ग़ज़ल की विधागत जानकारी संतोषजनक मात्र में नहीं है, फिर भी कई ग़ज़लकार ऐसे हैं, जिन्होंने ग़ज़ल को बड़ी हद तक समझा है और वे अच्छी ग़ज़लें कह रहे हैं। लेकिन प्रेरणा का सबसे बड़ा और सबसे पहला स्रोत दुष्यंत की आवाज़ और उनका लहजा ही है। उनके ग़ज़ल-संग्रह ‘साये में धूप’ के अब तक कितने ही संस्करण छप चुके हैं। आज भी ग़ज़ल-प्रेमियों को दुष्यंत के जितने ‘अशआर’ कंठस्थ हैं, शायद ही किसी दूसरे ग़ज़लकार के हों। इसका कारण है कि दुष्यंत की आवाज़, उनके लहजे और अंदाज़ में जो नयापन तथा आकर्षण है, उसमें जो प्रभाव और तेवर है, वह किसी और में उतना नहीं है।’’
दुष्यंत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने अपने समय के सामाजिक एवं राजनीतिक विषयों को अपनी ग़ज़ल का विषय बनाया। उन्होंने ग़ज़ल के स्वरूप को छेड़ा नहीं बल्कि उसे ज्यों का त्यों अपना लिया। भाषा और विषय पर उनका जादू चल निकला। दुष्यंत ने जिन विषयों को चुना उन्हें भरपूर अभिव्यक्ति दी। दुष्यंत की ग़ज़ल के अशआर सामाजिक या राजनीतिक दस्तावेज़ ही बनकर नहीं रहे बल्कि ग़ज़ल की कलात्मकता का उदाहरण बन गए।

गूँगे निकल पड़े हैं, जबाँ की तलाश में,
सरकार के ख़िलाफ ये साज़िश तो देखिए।

उनकी अपील है कि उन्हें हम पसंद करें,
चाकू से पसलियों की गुज़ारिश तो देखिए।

स्पष्ट हो जाता है कि उक्त दोनों शेर तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में कहे गए हैं।
इन शेरों को देखें-

वह आदमी नहीं है, मुकम्मल बयान है,
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है।

फिसले जो इस जगह तो लुढकते चले गए,
हमको पता नहीं था कि इतना ढलान है।

‘माथे की चोट’ वाले आदमी को ‘मुकम्मल बयान’ बताकर दुष्यंत ने स्वयं कुछ न कहते हुए सब कुछ कह दिया है। दुष्यंत माथे की चोट वाले आदमी की तरफ़ केवल इशारा करते हैं और उसे ‘मुकम्मल बयान’ बताकर स्वयं दूर जाकर खड़े हो जाते हैं।

दूसरे शेर से समझ में आ जाता है कि ऊँचाइयों पर ले जाने की बात करने वालों ने किस प्रकार आम आदमी को ऐसी राह पर धकेल दिया है, जहाँ ऐसा ढलान है कि आदमी खड़ा हो तो आगे मुँह के बल गिर जाने का ख़तरा दिखायी दे जाता है।
दुष्यंत ने बखूबी प्रतीकों को से अपनी बात कही है। इन शेरों को देखें-

समुद्र और उठा, और उठा, और उठा,
किसी के वास्ते ये चाँदनी बबाल हुई।

उन्हें पता भी नहीं है कि उनके पाँवों से,
वो खूँ बहा है कि ये गर्द भी गुलाल हुई।

दोनों शेर ग़ज़लकार की कलाकारी का अद्भुत उदाहरण हैं। यहाँ समुद्र और चाँदनी जैसे प्रतीकों से विशेष प्रकार की कलात्मकता उत्पन्न हो गई है। चतुर्दशी की रात में समुद्र में ज्वार आता है और समुद्र उफनने लगता है। कवि कहने में सफल हुआ है कि आजादी के बाद भारत में जो राजनीतिक उफान आया है वो स्वतंत्रता के कारण ही आया है । कवि इसी स्वतंत्रता को यहाँ चांदनी मानता है। दूसरे शेर में कवि ने भयंकर कमाल कर दिखाया है। पाँवों से बहने वाले खून ने मिट्टी को भी गुलाल का रूप दे दिया है। यह बात दुष्यंत ने उन लोागों के लिए कही है जो दिनभर मेहनत-मजदूरी कर पेट भरने का प्रयास करते हैं। इस एक शेर ने भारतीय ग़रीबी के हालातों पर करारा प्रहार भी किया है।
दुष्यंत के लिए हर आदमी का अपना दर्द था। उनका यह शेर देखें-

आज मेरा साथ दो, वैसे मुझे मालूम है,
पत्थरों में चीख़ हरगिज़ कारगर होगी नहीं।

हालांकि कुछ विद्वान इन दोनों पंक्तियों में काल दोष(पहली पंक्ति वर्तमान और दूसरी भविष्य में) मानते हैं। मिथकों को तोड़ना और कलात्मकता के साथ अपने बात कहने में दुष्यंत को जैसे महारत हांसिल थी। सुभाष चंद बोस कहते हैं ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा’। सुभाष जानते थे कि खून के बदले आजादी अवश्य मिल जाऐगी। यहाँ दुष्यंत भी जानते हैं कि लोग अगर साथ दें तो उन्हें उनके अधिकार मिल ही जाएंगे किंतु साथ ही वह यह भी जानते हैं कि भविष्य को संवारने के लिए आज कोई भी साथ देने वाला नहीं है।
दुष्यंत यर्थाथ को जीते थे। वो सामाजिक स्थिति को दिन ब दिन ख़राब हो ते देख रहे थे-

हालाते-जिस्म, सूरते-जाँ और भी ख़राब,
चारों तरफ़ ख़राब, यहाँ और भी ख़राब।

यही नहीं वो आतंकी गतिविधयों को ध्यान में रखकर कहते हैं-

सैर के वास्ते सड़कों पे निकल आते थे,
अब तो आकाश से पथराव का डर लगता है।

जो लोग जानबूझकर बेवकूफ़ बने रहते हैं या बनने का नाटक करते हैं। उन लोगों के लिए दुष्यंत ने क्या खूब कहा है-

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता,
हम घरों में भटके हैं, कैसे ठौर-ठिकाने आएँगे।

दुष्यंत आशावादी कवि थे और लोगों को भी आशावादी बनने की प्रेरणा देते थे-

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

देखें दुष्यंत की कुछ ग़ज़लें-

कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिए,
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है,
चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए।

न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढँक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफ़र के लिए।

खुदा नहीं, न सही, आदमी का ख़्वाब सही,
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए।

तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर की,
ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए।

जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।

कैसे मंजर सामने आने लगे हैं,
गााते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है,
जिसमें तहख़ानों से तहख़ाने लगे हैं।

मौलवी से डँट खाकर अहले मक़तब,
फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं।

ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,
मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा।

यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ,
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा।

ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते,
वो सब-के-सब परीशँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा।

 

दुष्यंत कुमार कृत अन्य कृतियां

एक कंठ विषपायी (काव्य नाटक)
दुष्यंत कृत एक कंठ विषपायी एक काव्य नाटक है। जिसमें वर्तमान परिस्थितियों को बड़ी ही सरलता के साथ उकेरा गया है।
देवत्त्व और आदर्शों का परिधान ओढ़
मैने क्या पाया….?
निर्वासन!
प्रेयसी वियोग!!
हर परंपरा के मरने का विष
मुझे मिला
हर सूत्रपात का श्रेय ले गए लोग।
मैं ऊब चुका हँ
इस महिमा-मंडित छल से….।
एक कंठ विषपायी की ये पंक्तियाँ क्या इस बात की ओर इशारा नहीं करती कि सह रास्ते पर चलने वाले आज के उन समस्त लोगों के लिए, जिन्हें पग-पग पर वैसी ही अवहेलना झेलनी पड़ रही है? क्योंकि आज तो हर कदम पर शिवत्व तिरस्कृत हो रहा है, न्याय की अवहेलना हो रही है। योग्यता की पूछ नहीं। काबिलों व उनके कैरियर की निर्मम हत्या हो रही है। उन्हें मिल रहा है- निर्वासन व जीवन का ज़हर और अयोग्यों को अन्याय कारणों से मिल रहा है-सत्ता, सम्मान व सुख….सब कुछ।

जलते हुए वन का वसंत (काव्य संग्रह)
दुष्यंत कुमार आम आदमी के कवि थे। तभी तो उन्होंने प्ुस्तक की भूमिका में लिखा- ‘ये कविताएँ इसी हद तक मेरी हैं कि मैंने इन्हें लिखा और भोगा है। यदि आपको इनमें पहचाना-सा स्वर, आत्मीय-सी भाषा और अपनी-सी बात नज़र आए तो यह मेरी सफलता है।’ कवि स्वीकार करता है कि ‘मेरे पास कविताओं के मुखौटे नहीं हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राएँ नहीं हैं और अजनबी शब्दों का लिबास नहीं है। मैं एक साधारण आदमी की पीड़ा, उत्तेजना, दबाव, अभाव और उसके संबंधों के उलझावों को जीता और व्यक्त करता हूँ।
कवि दुष्यंत ने किसी को चैंकाने या किसी चमत्कार के लिए कविता नहीं लिखी। कविता को परिभाषित करते हुए दुष्यंत स्वीकारते हैं-‘मैं कविता को चैंकाने या आतंकित करने के लिए इस्तेमाल नहीं करता, गो कि ऐसा करके लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा जा सकता है। परंतु कविता से केवल यह अपेक्षा, कितनी कम है। मैं जानता हूँ कि अहसास के अनेक स्तरों को चीरती हुई, व्यक्तित्व के भीतर दूर तक उतर जाने वाली चीज़, कविता होती है। उसे इतनी छोटी भूमिका नहीं दी जा सकती। समाज और व्यक्ति के संदर्भ में उसका दायित्व, इससे बहुत बड़ा है।’ कवि कहता है-‘कविता यातना से पैदा होती है।’
‘जलते हुए वन का वसंत’ कवि की कविताओं का तीसरा संग्रह है। जिसमें अवगाहन सहित कुल 45 कविताएँ हैं। संग्रह को तीन खंडों में बांटा गया है। पहले खंड को कवि ने इतिहास-बोध नाम दिया है और यह खंड शानी के नाम है। इसमें दस कविताएँ हैं जिनमें योग-संयोग, यात्रनुभूति, उपक्रम एक सफ़र पर, परवर्ती-प्रभाव, शगुन-शंका, सुबह: समाचार-पत्र के समय, आत्मालाप, अस्ति-बोध और वसंत आ गया शामिल की गयी हैं।
दूसरे खंड को देश-प्रेम का नाम दिया गया है। यह खंड सत्येन के नाम है। इसमें देश-प्रेम, ईश्वर को सूली, चिंता, देश, जनता, मौसम, तुलना, युद्ध और युद्ध-विराम के बीच, मंत्री की मैना, सवाल, एक चुनाव-परिणाम, कहाँ से शुरू करें यात्र, और गाते-गाते कुल 13 कविताएँ हैं।
तीसरे खंड को चक्रवात नाम दिया गया है। यह खंड रमाकांत के नाम है। इसमें एक शाम की मनःस्थिति, वर्षें बाद, प्रतीति, गीत वर्षा, स्वस्तिक क्षण, एक निमंत्रण का उत्तर, पहुँच, विदा, विदा के बाद: प्रतीक्षा, एक जन्म दिन पर, यह साहस, एक साम्य, एक और प्रसंग, साँझ: एक विदा-दृश्य, सृष्टि की आयोजना, एक समझौता, हांठों के नीचे फिर, गीत, मेरे स्वप्न, और तुझे कैसे भूल जाऊँ कुल 21 कविताएँ हैं।

आंगन में एक वृक्ष (उपन्यास)
दुष्यंत कुमार ने बहुत कुछ लिखा पर जिन अच्छी कृतियों से उनके रचनात्मक वैभव का पता चलता है, यह उपन्यास उनमें से एक है। उपन्यास में एक सामंती परिवार और उसके परिवेश का चित्रण है। सामंत ज़मीन और उससे मिलने वाली दौलत को कब्जे में रखने के लिए न केवल ग़रीब किसानों, अपने नौकर-चाकरों और स्त्रियों का शोषण और उत्पीड़न करता है, बल्कि स्वयं को और जिन्हें वह प्यार करता है, उन्हें भी बर्बादी की तरफ ठेलता है, इसका यहाँ मार्मिक चित्रण किया गया है।
उपन्यास बड़ी शिद्दत से दिखाता है कि अंततः सामंत भी मनुष्य ही होता है और उसकी भी अपनी मानवीय पीड़ाएँ होती हैं, पर अपने वर्गीय स्वार्थ और शोषकीय:तबे को बनाए रखने की कोशिश में वह कितना अमानवीय होता चला जाता है इसका खुद उसे भी अहसास नहीं होता।
उपन्यास के सारे चरित्र चाहे वह चंदन, भैनाजी, माँ, पिताजी और मंडावली वाली भाभी हों या फिर मुंशीजी, यादराम, भिक्खन चमार आदि निचले वर्ग की हों सभी अपने परिवेश में पूरी जीवंतता और ताज़गी के साथ उभरते हैं। उपन्यासकार कुछ ही वाक्यों में उनके पूरे व्यक्तित्व को उकेरकर रख देता है और अपनी परिणति में कथा पाठक को स्तब्ध तथा द्रवित कर जाती है। दुष्यंत कुमार की भाषा के तेवर की बानगी यहाँ भी देखने को मिलती है- कहीं एक भी शब्द फालतू, न सुस्त।

अत्यंत पठनीय तथा मार्मिक कथा-रचना
और इसी दिन का मुझे इन्तज़ार रहता। चंदन भाई साहब आते तो मेरे लिए घर में नुमाइश-सी लग जाती। रंग-बिरंगे कपड़े, अजीबो-ग़रीब खिलौने, जापानी पिस्तौल और गोलियाँ और इनके अलावा खूबसूरत डिब्बों में बंद टाफियाँ व चाॅकलेट ओर यह सब कुछ अकेले मेरे लिए। माँ हमेशा उन्हें डाँटती, ”चंदन, तू इतने पैसे क्यों फूँकता है रे?“
”कहाँ बीजी! देखो, तुम्हारे लिए तो कुछ भी नहीं लाया इस बार।“ भाई साहब बड़ी मधुर आवाज़ में, सहज मुस्कान होठों पर लाकर सफ़ाई देते। माँ बड़बड़ाती हुई रसोईघर में चली जाती है और मैं भाई साहब के और पास सरक आता। मेरी तरफ मुख़ातिब होते हुए वे धीरे-से मेरे कान में कहते, ”बीजी से ज़िक्र मत करना, उनके लिए भी साड़ी लाया हूँ। जाते हुए दूँगा।“ फिर अचानक गम्भीर होकर पूछते, ”हाँ भई, क्या प्रोग्राम है आज का?“
मैं प्रोग्राम का मतलब नहीं समझता था। केवल उनकी ओर प्यार और श्रद्धा से निहारता रहता। वे हँसकर मुझे अपने से चिपटा लेते और खुद ही समझाते, ”तो फिर यह तय रहा कि दोपहर में म्यूजिक, शाम को शिकार और रात में यादराम के हाथ के पराठे और तीतर?“
मैं गरदन हिलाकर सहमति प्रकट करता और तत्काल मेरी आँखों में यादराम की गंजी चाँद और पराँठे बेलते समय उसकी कनपटियों पर बार-बार उभरती-गिरती नसों की मछलियाँ तैरने लगतीं।
यादराम भाई साहब का ख़ानसामा था। भाई साहब जब भी मुरादाबाद से आते, यादराम साथ ज़रूर आता। दोपहर का भोजन भाई साहब माँ के रसोईघर में बैठकर करते। मगर शाम को पिताजी और मैं दोनों ही उनके साथ यादराम के हाथ के पराँठे खाते। सिर्फ़ माँ अपनी रसोई अलग पकाती थीं।
”क्यों यादराम, तेरी चाँद के बाल कहाँ गए?“ मैं अक्सर यह सवाल उससे पूछा करता। और यादराम हमेशा इसका एक जवाब देता, ”बाबूजी के जूते चाट गए, लल्लू।“
माँ को यादराम एक आँख नहीं भाता था। शुरू-शुरू में उन्होंने मेरे वहाँ खाने का बड़ा विरोध किया। लेकिन कुछ तो मेरी अपनी ज़िद और कुछ भाई साहब के अनुनय-अनुरोध के सामने उन्हें झुक जाना पड़ा। मुझे खूब याद है कि स्वभाव से बहुत कठोर होने के बावजूद माँ भाई साहब की बात नहीं टालती थीं। यह और बात है कि उसके बाद भी वे मुझे लेकर बराबर भाई साहब और पिताजी, दोनों को यह ताना देती रहतीं कि उन्होंने ‘छोटे’ को भी म्लेच्छ बना दिया है।
गाँव में भाई साहब एक भूचाल की तरह आते थे और डेढ़-दो हजार आदमियों की उस छोटी-सी बस्ती में, हर जगह, हर कदम पर अपने नक़्श और छाप छोड़ जाते थे। उनके जाने के बाद कई दिनों तक लोग क़िस्से-कहानियों की तरह उन्हें याद करते रहते ओर अक्सर यही ज़िक्र हुआ करता, ”देखो, कितना बड़ा आदमी है, मगर घमंड छू तक नहीं गया!“ भिक्खन चमार- जिसे भाई साहब ‘मूविंग रेडियो स्टेशन’ कहा करते थे, उनके चले जाने के बाद, अपने ठेठ किस्सागोई के अन्दाज़ में उनकी कहानियाँ सुनाता, ”अरे भैया, बाबू आदमी थोड़ई हैं, फिरस्ते हैं। उस दिन सुबह-सुबह बंदूक लिए हुए आ गए। बोले- ‘क्यों मूविन रेडियो-टेसन’ अकेले-अकेले माल उड़ा रये हो!“ मैंने कहा- बाबू, माल कहाँ, खिचड़ी है, तुम्हारे खाने की चीज नईं। बस, बिगड़ गए। बोले- ‘अच्छा! तुम अकेले खाओगे और हम तुम्हारा मुँह देखेंगे?’ और साहब, भगवान झूठ न बुलाए, मैंने लुकमा बनाने के लिए थाली की तरफ हाथ बढ़ाया, तो धड़ाक। साला दिल धक् से हो गया और साहब, सूँ-सूँ करता हुआ एक कव्वा भड़ाक से थाली में आगे गिरा। राम!!! राम!!! कहाँ का खाना! हाथ जोड़कर उठ खड़ा हुआ। क्या करता? मगर क्या बेचूक निशाना। साले उड़ते पंछी कू जहाँ चाहा, वहाँ गिरा दिया।“
निशाने की तारीफ़ भाई देवीसहाय जी भी किया करते थे। मगर उससे भी ज्यादा वे भाई साहब के गले पर मुग्ध थे। उनका तकिया-कलाम ‘ओख़्खो जी’ था। इसलिए भाई साहब उन्हें ‘ओख्खो भाई साहब’ कहा करते थे। उनके म्यूजिक प्रोग्राम में बुजुर्गों का प्रतिनिधित्व केवल ‘ओख्खो भाई साहब’ किया करते थे। हम बच्चों का इस प्रोग्राम में बैठने की इजाज़त नहीं होती थी। लिहाज़ा हम हाॅल के बन्द दरवाज़ों के पास कान लगाकर सुना करते। तबले के ठोकने, हारमोनियम के स्वर मिलाने और भाई साहब के आलाप लेने से शुरू कर खत्म होने तक हम कई लड़के वहाँ खड़े रहते और जब भाई देवीसहाय जी कहते, ‘ओख्खो जी, क्या चीज़ सुनाई है, भाई चन्दन!’ कहाँ से मार दी? तो बड़े लड़के कान लगाकर गौ़र से सुनने की कोशिश किया करते थे।
मुझे उस समय तक संगीत में इतनी दिलचस्पी नहीं थी। इसलिए मुझे जब भी भाई साहब की याद आती, तो उनकी बातें और कहानियाँ सुनने के लिए मैं ओख्खो भाई साहब की बनिस्बत, भिक्खन चमार की बातें सुनना ज्यादा पसंद करता, जो उन्हें एक महान् और आदर्श नायक के रूप में पेश किया करता था।
लेकिन मंडावली वाली भाभी, जो रिश्ते में हमारी कुछ न होते हुए भी बहुत कुछ होती थी, न तो भाई साहब की महानता के किस्से सुनातीं और न पौरुष के, बल्कि कई घंटो अपनी ही शैली में, उनकी बड़ी-बड़ी आँखों का और उनके रंग-रूप का, उनके सौन्दर्य काऔर उनकी शरारतों का हाव-भाव सहित वर्णन किया करती थीं। मेरी तरह उन्हें भी भाई साहब पसन्द थे और भाई साहब की बातें सुनाने में वे उतना ही रस लेतीं थीं, जितना मैं सुनने में।
”पिछली बार मैंने खूब सुनाई,“ भाभी सुनाया करती थीं, ”मैंने कहा- लालाजी, कहीं भले घर के लड़के पान खाया करते हैं! हमारे ख़ानदान में तो किसी लड़के ने शादी से पहले पान छुआ तक नहीं था। तुम्हारे ख़ानदान में अक्ल के चिराग़ ऐसे बुझ गए कि कोई कहनेवाला ही नहीं रहा।“ बस भैया, इतना सुनना था कि लगे हाथ-पाँव जोड़ने- ‘अरे मेरी प्यारी गुलाबी भाभी! मुझे माफ़ कर दो। मैं कान पकड़ता हूँ, अब कभी पान नहीं खाऊँगा।’

आवाज़ों के घेरे  (काव्य संग्रह)
अपने आप से अपने परिवेश और व्यवस्था से नाराज़ कवि के रूप में दुष्यंत कुमार की कविताएँ हिंदी का एक आवश्यक हिस्सा बन चुकी हैं। आठवें दशक के मध्य और उत्तरार्द्ध में अपनी धारदार रचनाओं के लिए बहुचर्चित दुष्यंत जिस आग में होम हुए, उसे अपनी रचनाओं में लंबे समय तक महसूस किया जाता रहेगा।
आवाजों के घेरे दुष्यंत कुमार का एक ज़रूरी कविता-संग्रह है। इसमें धुआँ-धुआँ होती उस शख्सियत को साफ तौर पर पहचाना जा सकता है लेकिन रचनात्मक स्तर पर कवि का यह विरोध व्यवस्था से अधिक अपने आप से है, जहाँ व्यक्ति न होकर वह एक वर्ग है- मुठ्ठियों को बाँधता और खोलता। बाँधना, जो उसकी जरूरत है ओर खोलना, मजबूरी। एक प्रकार निरर्थकता और ठहराव का जो बोध इन कविताओं में है, वह सार्थक और गतिशील होने की गहरी छटपटाहट से भरा हुआ है। स्पष्टतः कवि का यही द्वंद्व और छटपटाहट इन कविताओं का रचनाधर्म है, जिसे सहज और सार्थक अभिव्यक्ति मिली है।
दुष्यंत लय के कवि हैं, इसलिए मुक्तछंद होकर भी ये कविताएँ छंदमुक्त नहीं हैं। साथ ही यहाँ उनके कुछ गीत भी हैं और बाद में सामने आयी बेहतरीन ग़ज़लों की आहटें भी। संक्षेप में, यह संग्रह दुष्यंत की असमय समाप्त हो गयी काव्य-यात्र का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।
आज
अक्षरों के इस निविड़ वन में भटकतीं
यह हजारों लेखनी इतिहास का पथ खोजती हैं
…क्रांति! …….. कितना हँसो चाहे
किंतु ये जन सभी पागल नहीं।

रास्तों पर खड़े हैं पीड़ा भरी अनुगूँज सुनते
शीश धुनते विफलता की चीख़ पर जो कान
स्वर-लय खोजते हैं
ये सभी आदेश-बाधित नहीं।

इस विफल वातावरण में
जो कि लगता है कहीं पर कुछ महक-सी है
भावना हो… सवेरा हो….
या प्रतीक्षित पक्षियों के गान-
किंतु कुछ है;
गन्ध-बासित वेणियों का इंतज़ार नहीं।

यह प्रतीक्षा: यह विफलता: यह परिस्थितिः
हो न इसका कहीं भी उल्लेख चाहे
खाद-सी इतिहास में बस काम आये
पर समय को अर्थ देती जा रही है।

आवाज़ों के घेरे
आवाजें….
स्थूल रूप धरकर जो गलियों, सड़कों में मँडलाती हैं,
कीमती कपड़ों के जिस्मों से टकराती हैं,
मोटरों के आगे बिछ जाती हैं,
दुकानों को देखती ललचाती हैं,
प्रश्न चिन्ह बनकर अनायास आगे आ जाती हैं-
आवाजें! आवाजें, आवाजें!!

मित्रों!
मेरे व्यक्तित्व और मुझ-जैसे अनगिन व्यक्तित्वों का क्या मतलब?
मैं जो जीता हूँ, गाता हूँ, मेरे जीने, गाने
कवि कहलाने का क्या मतलब?
जब मैं आवाजों के घेरे में
पापों की छायाओं के बीच
आत्मा पर बोझा-सा लो हूँ

संपादन के क्षेत्र में दुष्यंत कुमार
दुष्यंत कुमार ने विभिन्न विधाओं को अपनाते हुए साहित्य सेवा की है। उन्होंने नवोदित साहित्यकारों का मार्गदर्शन भी किया है। इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका विहान इसका उदाहरण है।


विहान (द्वैमासिक पत्रिका)1953
इलाहाबाद से ‘विहान’ का संपादन दुष्यंत कुमार, कमलेश्वर और मार्कंडेय तीनों ने मिलकर किया था। इस पत्रिका के कुल कितने अंक प्रकाशित किए गए, यह तो ज्ञात नहीं हो पाया किंतु विहान का प्रथम अंक मार्च-अप्रैल 1953 में प्रकाशित हुआ था। विहान के प्रबंध संपादक विश्वनाथ प्रसाद जायसवाल थे। जबकि प्रबंध समिति में उमेश चन्द्र उपाध्याय, हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव, दुष्यंत कुमार त्यागी, जितेन्द्र जायसवाल और राधेमोहन सिन्हा थे। विहान के प्रथम अंक के रूप सज्जाकार थे कमलेश्वर और आवरण पृष्ठ पर जो चित्र प्रयोग किया गया था वह था ‘भोर हुई बज उठी बाँसुरी’ यह चित्र चित्रकार के.बी. द्वारा बनाया गया था।
विहान के रचनाकार
विहान के प्रथम अंक के रचनाकार प्रकाश चंद्र गुप्त, भगवत शराण उपाध्याय, रघुपति सहाय ‘फ़िराक’, श्री कृष्णदास, नेमीचंद जैन, विद्यानिवास मिश्र (लेख, निबंध), मार्कण्डेय, कमलेश्वर, अमृतराय, परमानंद गौड़ (कहानी,स्कैच), केदार, नागार्जुन, सतीश दत्त पांडे, गंगाप्रसाद श्रीवास्तव, अजित कुमार, दुष्यंत कुमार, युक्तिभद्र दीक्षित(कविताएं) रहे।
नए रचनाकारों को प्रोत्साहन
दुष्यंत कुमार ने नए रचनाकारों को भी खूब प्रोत्साहन दिया। विहान के अपने अग्रिम लेख में उन्होंने लिखा है- ‘इस अंक में हम तीन बिल्कुल अपरिचित प्रतिभाओं को आपसे परिचित करा रहे हैं। श्री सतीश पांडे, श्री युक्तिभद्र दीक्षित और श्री परमानन्द गौड़। तीनों ही ऐसे लेखक हैं जिनकी लेखनी का लोहा एक न एक दिन सबको मानना पड़ेगा। हम चेष्टा करेंगे कि अगले अंकों में भी इनकी रचनाएँ देते रहें। और भी बहुत से नए लेखकों को खोज निकालने का जिम्मा हमने लिया है और विश्वास करते हैं कि हर अंक में आप से एक न एक नए लेखक दोस्त का परिचय कराते रहेंगे।’

दुष्यंत कुमार के बारे में अन्य विद्वानों के विचार

कमलेश्वर
दुष्यंत कुमार ने विस्फोटक ग़ज़लें लिखकर हिंदी कविता का रचनात्मक मिज़ाज और मौसम ही बदल दिया। हालांकि इसे हमारे बौद्धिकताग्रस्त रचनावादी-छद्म कलावादी और साहित्य के स्वर्ण कवि अभी खुलेआम स्वीकार करने की मुद्रा में नहीं हैं, पर वे जानते हैं कि उनके पैर तले की ज़मीन खिसक चुकी है। हमेशा से हिंदी साहित्य का सवर्ण अभिजात्य साहित्य के अनुशीलन और इतिहास पर गुंजलक मारकर बैठा रहा है। इसने लोक-स्वीकृति को हल्का बनाने के लिए उसी के वज़न पर एक शब्द-गढ़ा है-लोकप्रियता और इसे हेय माना गया है। यह रवैया उन्हीं अभिजात्य-वर्गीय साहित्यकारों का है जो साहित्य के सवालों पर बड़ी रेशमी बहसें करते हैं लेकिन अपने समय के सवालों का सामना नहीं कर पाते। ये लोग अपने ड्राइंगरूमों या मुर्दा सभागारों में ‘रचना का लोकतंत्र’ स्थापित करते रहते हैं और ज़रूरत पड़ी तो बहुत सोच-समझकर, आगा-पीछा देखकर सार्वजनिक सवालों पर जारी किए जाने वाले जनहितवादी बयानों पर अपना नाम देने की अनुमति भी दे देते हैं लेकिन शब्द-सृष्टि के यह वे उपजीव हैं, जो अपने संकुल समय की स्मृति की स्वीकृति न पाने के बावजूद ‘साहित्य के लिए’ किताबों से किताबों में जीवित बने रहने के गैर-साहित्यिक उपक्रम करते रहते हैं।

विजय बहादुर सिंह
जब वे पढ़ते थे, तब कक्षा में और कक्षा के बाहर की कक्षाओं में भी। लिखना शुरू किया, तो लेखन की सधी-बदी राहों, चैहदियों, फैशनों और काव्य-मुहावरों की भीड़ में भी। न तो वे कभी डरे, न सहमे। न झुके, न टूटे। दोस्तों के बीच, कभी-कभी दुश्मनों और दुश्मनों के दोस्तों के साथ भी, यारों के यार की तरह उठते-बैठते। उनकी दोस्ती अगर किसी बात से थी, तो इसी आज़ादी से थी और इसके लिए जिस पुरुषार्थ की जरूरत उन्हें थी, वह उनके स्वभाव और संस्कारों में जन्मना मौजूद था।

 

राजेश कुमार व्यास
हिंदी ग़ज़ल में दुष्यंत ने सर्वथा नया मुहावरा गढ़ा। इस नए मुहावरे में मनुष्य की जिजीविषा के साथ उसकी वेदना और टूटन को गहराई से महसूस किया जा सकता है। ख़ास बात यह भी कि जीवन के मर्म को समझाती उसकी ग़ज़लों में व्यक्ति और जीवन की बारीक़ पड़ताल है, उसके ख़तरे हैं, जो कुछ घटित हो रहा है, उस पर करारी चोट है और वह विशाल दृष्टिसंपन्नता भी, जिसमें सबकुछ अनुकूल न होते हुए भी भविष्य के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण छिपा है। ग़ज़ल की परंपरागत:ढ़ियों को तोड़ती दुष्यंत की ग़ज़लों में जीवनानुभवों की इतनी विविधता है कि उससे दौर और दायरों की पहचान स्वतः ही होती है।

 

धर्मवीर भारती
सुविधाओं और पद-प्रतिष्ठा से लैस चंद आलोचक एक झूठा मुखौटा लगा कर एक बने-बनाये पूर्वग्रह के साथ जो एक नकली विद्रोही साहित्य-चिंतन और उससे उद्भूत तीसरे दर्जे का घटिया काव्यजाल पाठकों पर थोप रहे थे, उस कृत्रिम काव्य-संसार में एक प्रामाणिक दर्द भरी आवाज़ थी इन ग़ज़लों की, जो बिना किसी आलोचक की शब्दाडंबरी वकालत के पाठक को व्यापक स्तर पर छू गयी। एक सच्ची और तीख़ी अकेली छूटी हुई रचना, झूठे शब्दजाल के विराट काव्याडंबर को कैसे पल भर में नक़ली और जाली साबित कर अपने को प्रतिष्ठित कर लेती है, इसका प्रमाण दुष्यंत की ग़ज़लें हैं।

 

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
दुष्यंत बड़ा मायावी था। बहुत कम लोग होते हैं, जो इतनी खुली ज़िन्दगी जीते हों और फिर भी मायावी कहाते हों। स्वस्थ, सुन्दर, दिलफेंक, ज़िंदादिल आदमी था वह। उसके दोस्त भी बहुत थे और दुश्मन भी। इस फ़ेहरिस्त को बढ़ाते जाना ही उसकी ज़िंदगी थी। यदि किसी लड़की के पीछे किसी ग़ैर मोहल्ले में उसका क़त्ल किए जाने की ख़बर आती या किसी शराबख़ाने में ज़हरीली शराब पी जाने से मरने की, तो किसी को उतना अचरज नहीं होता, लेकिन दिल के दौरे से उसका मरना बहुत बड़ा मज़ाक लगता है। उसे न तो दिल का कोई रोग था, न ही कभी कोई इस तरह की शिकायत थी। परेशानियों में अपने को फँसाना फिर बहुत सफ़ाई से उनसे निकल जाना, दिल में कोई मलाल न रखना, न कोई बोझ ढोना, अपने दोस्तों में वह सबसे ज़्यादा जानता था। वह बीमार आदमी नहीं था। न तन से, न मन से, न आदत से। वह बेहद हँसमुख था। अलमस्त, बेफ़िक्र, तनाव को गर्द की तरह झाड़ देना वह जानता था। उसे बहुत जल्दी ख़ुश किया जा सकता था।
उसकी हवस दुनियादारी की हवस थी। वह सब कुछ पा लेना चाहता था। कभी बच्चों की तरह मचल कर, कभी जूझ कर, कभी हिसाब-किताब भिड़ाने के ख्वाब देखकर। जब उसका चाहा नहीं हो पाता, तो वह उदास होता, गालियाँ देता और अपने रास्ते के रोड़ों को नेस्तनाबूद करने के लिए ज़मीन और आसमान के कुलाबे मिलाता देखा जाता। पर, दुनिया उसके हिसाब से नहीं चलती थी और वह भी बहुत चाह कर भी दुनिया के हिसाब से नहीं चल पाता था और जितना नहीं चल पाता था, उसी की ताक़त से वह लिखता था।

 

निदा फ़ाज़ली
दुष्यंत नाम के दर्शन पहली बार महान नाटककार कालिदास की नाट्य रचना ‘शाकुंतलम्’ में होते हैं। उसमें यह नाम एक राजा का था, जो शकुंतला को अपने प्रेम की निशानी के रूप में एक अंगूठी देकर चला जाता है। और शकुंतला की जीवन यात्र इसी अंगूठी के खोने और पाने के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। राजा दुष्यंत के सदियों बाद बिजनौर की धरती ने एक और दुष्यंत कुमार को जन्म दिया।
इस बार वह राजा नहीं थे, त्यागी थे। दुष्यंत कुमार त्यागी। इस दुष्यंत कुमार त्यागी के पास न राजा का अधिकार था, न अंगूठी का उपहार और न ही पहली नज़र में होने वाला प्यार था। 20 वीं सदी के दुष्यंत को कालिदास के युग की विरासत में से बहुत कुछ त्यागना पड़ा। इस नए जन्म में वह आम आदमी थे। आम आदमी का समाज उनका समाज था। आम आदमी की लड़ाई में शामिल होना उनका रिवाज़ था। आम आदमी की तरह उनकी मंज़िल भी सड़क, पानी और अनाज था।

दुष्यंत साहित्य में बहुत कुछ कर के और जीवन की बड़ी धूप-छाँव से गुज़र के ग़ज़ल विधा की ओर आए थे। दुष्यंत जिस समय ग़ज़ल संसार में दाखिल हुए उस समय भोपाल प्रगतिशील शायरों ताज भोपाली और कैफ भोपाली की ग़ज़लों से जगमगा रहा था। इनके साथ हिंदी में जो आम आदमी अज्ञेय के ड्राइंगरूम से और मुक्तिबोध की काव्यभाषा से बाहर कर दिया गया था। बड़ी खामोशी से नागार्जुन और धूमिल की ‘संसद से सड़क तक’ की कविताओं में मुस्कुरा रहा था। इसी जमाने में फ़िल्मों में एक नए नाराज़ हीरो का आम आदमी के रूप में उदय हो रहा था।

दुष्यंत की ग़ज़ल के इर्द-गिर्द के समाज को जिन आँखों से देखा और दिखाया जा रहा था वह वही आदमी था जो पहले कबीर, नज़ीर और तुकाराम के यहाँ नज़र आया था, जिसने नागार्जुन और धूमिल के शब्दों को धारदार बनाया था। उसी ने दुष्यंत की ग़ज़ल को चमकाया था।
दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के गुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है। यह गुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मों के ख़िलाफ़ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमाइंदगी करती है। विषय की तब्दीली के कारण, उनकी ग़ज़ल के क्राफ्ट में भी तब्दीली नज़र आती, जो कहीं-कही लाउड भी महसूस होती है। लेकिन इस तब्दीली ने उनके ग़ज़ल को नए मिज़ाज के क़रीब भी किया है।

दुष्यंत कुमार ने हिंदी साहित्य में जो काम किया है अभी उसका उचित मूल्यांकन नहीं हो पाया है। दुष्यंत कुमार और उनके साहित्य पर शोध की आवश्यक्ता है।

अमन कुमार त्यागी/आलोक कुमार त्यागी

संपर्क- 9897742814

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