मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ !

तीन तलाक पर सुप्रीमकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

‘‘तलाक दे तो रहे हो गुरूर-ओ-कहर के साथ
मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेहर के साथ’’

प्रेमपाल सिंह ‘वाल्यान’

सजनी भोपाली ने यह शेर तलाक पीड़ित मुस्लिम महिलाओं की मानसिक त्रासदी के किन हालात बयानी को लिखा होगा इसका आज, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
दरअसल तीन तलाक को सुप्रीम कोर्ट ने तो 32 साल पूर्व ही तलाक दे दिया था। जब 1985 में शाहबानों के मामले में तील तलाक के खिलाफ फैसला दिया था, लेकिन कठमुल्लाओं के दबाव में राजीव गांधी सरकार ने उस फैसले को पलट दिया था, उन्हीं के एक केन्द्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने सरकार के फैसले का जमकर विरोध किया था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष में और तीन तलाक के खिलाफ भाषण भी दिया था जो कि ऐतिहासिक महत्व रखता है। बाद में आरिफ ने सरकार के इस कदम के विरोध में अपना इस्तीफा भी दे दिया था।
आरिफ मोहम्मद खान ने अपना यह भाषण एम. बनातवाला द्वारा प्रस्तुत एक गैर सरकारी विधेयक के विरोध में 23 अगस्त 1985 को लोकसभा में दिया था। उन्होंने अपने भाषण की शुरूआत में देश के प्रथम शिक्षामंत्री तथा इस्लामिक कानून के जानकार मौलाना आजाद के विचारों का भी जिक्र किया था। आरिफ खान ने कहा था कि हम दबे हुए लोगों को ऊपर उठाकर ही यह कह सकेंगे कि हमने इस्लामिक सिद्धांतों का पालन किया है और उनके साथ न्याय किया है। लेकिन उनके विचारों व उनकी लड़ाई ने बीच में ही दम तोड़ दिया। अतीत की दबी हुई उस राख ने एक बार फिर सुलगना शुरू कर दिया। और इस बार की यह लड़ाई लड़ी है, पाँच देवियों ने। सबसे पहले इसकी शुरूआत की थी उत्तराखंड की रहने वाली सायरा बानों ने। इसने मुस्लिम समुदाय में तीन तलाक, निकाह, हलाला और बहु-विवाह के प्रचलन को असंवैधानिक घोषित किये जाने की मांग की थी। सायरा बानों की दास्तान बहुत ही दर्द भरी है।
काशीपुर (उधम सिंह नगर) के हेमपुर डिपो निवासी इकबाल अहमद की पुत्री शायरा बानों का निकाह वर्ष 2001 में बारह बाजार, इलाहाबाद निवासी रिजवान अहमद के साथ हुआ था। सायरा बानों ने कुमायूं विश्वविद्यालय से समाजशास्त्र में परास्नातक किया है। सायरा का कहना है कि पहला बच्चा लड़का हुआ, तब तक तो सब ठीक था, लेकिन दूसरी संतान बेटी पैदा होने के बाद पति का व्यवहार पूरी तरह बदल गया था। सात बार उसका गर्भपात कराया गया और उसके बाद सायरा के पिता को बुलाकर उसे मायके भेज दिया गया। और फिर 10 अक्टूबर 2015 को पति की ओर से तलाक आ गया। सायरा को लगा कि उसके अधिकारों का हनन हुआ है। वह अपने पिता की मदद से दिल्ली आई और एडवोकेट बालाजी श्रीनिवासन से मिलकर कोर्ट में याचिका दायर की।
जोधपुर की आफरीन रहमान की शादी 24 अगस्त 2014 को इंदौर के सैयद अशर अली वारसी के साथ जयपुर में हुई। दोनों का निकाह वैवाहिक वेबसाइट के माध्यम से हुआ था। रहमान विजनेस एडिमनिस्ट्रेशन में परास्नातक है तो वारसी ने पटियाला के राजीव गांधी नेशनल यूनिवर्सिटी आॅफ लाॅ से कानून की डिग्री ली है। वारसी की मां ने पहले तो कम दहेज लाने का ताना दिया, उसके बाद रहमान की नौकरी, उसकी शिक्षा और उसके चाल-चलन पर सवाल उठने लगे। वारसी ने 27 सितम्बर 2015 को रहमान को घर से निकाल दिया। रहमान 2 अक्टूबर 2015 को अपनी मां के साथ जोधपुर आ रही थी तभी एक दुर्घटना में उसकी मां नहीं रही, घायल रहमान को एक बार पति देखने तो आया लेकिन फिर वह कई संदेशे देने के बाद भी नहीं आया और आखिर में 29 जनवरी 2016 को वारसी का तलाकनामा स्पीडपोस्ट से आ गया। एक मार्च को दोनों प़क्षों में समझौते का प्रयास जयपुर में किया गया लेकिन यह प्रयास बेनतीजा रहा। इसके बाद 24 अप्रैल 2016 को पुलिस ने घरेलू हिंसा के केस में वारसी और उसकी मां को गिरफ्तार कर लिया। अप्रैल 2016 में रहमान सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
इशरत जहां जो कि पश्चिम बंगाल के हाबड़ा जिले की रहने वाली है। इनका निकाह 2001 में मुर्तजा के साथ हुआ था। शादी के कुछ समय बाद ही इनके ससुराल वाले व पति इन्हें घर से निकालने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन उसी दौरान पति दुबई चला गया। इन्हें इनके पति ने दुबई से ही 2015 में फोन पर तलाक दे दिया। इनका पति जबरन चार बच्चों को अपने साथ ले गया। इशरत ने तलाक की संवैधानिकता को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। याचिका में कहा था कि पति ने दूसरा निकाह कर लिया है तथा बच्चों को वापिस दिलाने और अपने लिए पुलिस सुरक्षा की मांग की थी। इन्होंने याचिका में लिखा था कि तीन तलाक गैर कानूनी है और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन है।
आतिया साबरी जो कि सहारनपुर उ.प्र. की निवासी है। इनका निकाह 2012 में हरिद्वार निवासी वाजिद अली से हुआ था। एक साल बाद बेटी हुई तो ससुराल वाले मारपीट करने लगे। और दूसरी बेटी पैदा होने के बाद तो सभी उसके खिलाफ हो गये। ससुराल वालों ने उसे जहर देकर मारने की भी कोशिश की। इसके बाद 2015 की एक रात को इन्हें घर से निकाल दिया गया। 2016 में पति ने कागज पर तीन तलाक लिखकर डाक से भेज दिया और उस पर दारूल उलूम से फतवा भी ले लिया लेकिन आतिया को इसकी खबर तक नहीं थी लेकिन आतिया का मामला मीडिया में काफी चर्चित हुआ। आतिया ने बार-बार यह मांग उठाई कि बेटा पैदा न होने पर किसी महिला को घर से निकालना अनुचित है।
गुलशन परवीन जो कि रामपुर उ.प्र. की रहने वाली है। गुलशन का निकाह 2013 में हुआ था। गुलशन का आरोप है कि पति अक्सर उसके साथ मारपीट करता था। पति नोएडा में काम करता था। 2016 में जब वह अपने मायके आयी हुई थी तो पति ने 10 रू. के स्टाम्प पेपर पर तलाकनामा लिखकर भेज दिया था जिसे गुलशन ने मानने से इंकार कर दिया था तो पति पारिवारिक अदालतमें चला गया। वहां उसने तलाकनामें के आधार पर निकाह खत्म करने की याचिका दी, लेकिन गुलशन ने हार नहीं मानी। गुलशन का दो साल का बेटा भी है।
तीन तलाक के खात्में पर बुद्धि जीवियों ने भी ज्यादातर सकारात्मक विचार व्यक्त किये हैं।
बंगलादेशी लेखिका तस्लीम नसरीन का कहना है कि तीन तलाक की प्रथा खत्म होना उस विशाल पत्थर को एक मामूली धक्का देने जैसा है, जो हिला तो है। लेकिन खिसका नहीं है। एक झटके में तीन तलाक खत्म होना शुरूआती पहल है। एक शांत तलाब में एक तरंग उठी है। इस उम्मीद के साथ कि यह किनारे तक पहुँचेगी।
शबाना आजमी का कहना है कि, मैं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तीन तलाक पर दिये गये फैसले का स्वागत करती हूँ। यह उन बहादुर मुस्लिम महिलाओं की जीत है, जिन्होंने कई सालों तक इसके विरूद्ध लड़ाई लड़ी है।
हापुड की जानी मानी चित्रकार कु. ऋतु सिंह का कहना है कि, इस्लाम के दो महान ग्रंथ हैं, कुरान और हदीस जिनमें तीन तलाक का कोई जिक्र नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला इन्हीं को आधार बनाते हुए दिया है। न्यायालय के इस फैसले से मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाला भेदभाव और शोषण खत्म होेगा और महिलाओं को उनके अधिकार मिलने की सम्भावना प्रबल होगी।
मेरठ की रहने वाली तथा एक पब्लिक स्कूल की प्रधानाचार्य आसमां खातून का कहना है कि आज शिक्षा पाकर अधिकांश महिलाएं काफी जागरूक हो चुकी हैं। अब वे धर्म ग्रंथों का भी अध्ययन कर रही हैं। उन्होंने अपनी मांगे भी कुरान शरीफ व शरीयत कानून के अंतर्गत रखी। क्योंकि धर्म गुरूओं ने कुछ बातों की गलत व्याख्या कर महिलाओं के खिलाफ लागू किया है, जिन्हें समय के साथ सच मान लिया गया।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से यही वर्ग बौखला उठा है। क्योंकि यह वर्ग आसानी से तीन तलाक कहकर नई-नई दुल्हनों का सुख भोग रहा था।
नासिरा शर्मा ने अपनी एक पुस्तक ‘‘औरत की आवाज’’ पैगम्बर के नवासे इमाम हुसैन की बहन हजरत जैनब को समर्पित की है, जिसमें लिखा है कि यजीद ने जब भरे दरबार में गुस्ताखी करनी शुरू की तो जैनब ने जिस आवाज से उसे ललकार कर जवाब दिया था, उसी वार्तालाप ने कर्बला की घटना की सच्चाई लोगों तक पहुंचाई। आज उनकी आवाज की गुंज हमको चारो तरफ सुनाई पड़ रही है और महसूस हो रहा है कि, औरतें एक के बाद एक बलात रस्म व रिवाज को खारिज करती जायेंगी।
भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह-संस्थापक तथा सर्वोच्च न्यायालय जनहित याचिकाकर्ता जकिया सोमन का कहना है कि, हमारा मानना है कि कोई भी सामाजिक बदलाव एक व्यापक प्रक्रिया से गुजर कर ही होता है। कानूनी बदलाव तो इस प्रक्रिया का महज एक हिस्सा होता है। लिहाजा यह फैसला अब हमारे हाथ में एक हथियार की तरह है। हमें इसे लेकर आगे बढ़ना होगा, उन्हें सशक्त बनाना होगा, खासतौर से लड़कियों, युवाओं व महिलाओं को। हमें समझना चाहिए कि मुसलमान भी इस देश के नागरिक हैं और उन्हें वही सब चाहिए जो एक आम नागरिक की दरकार है। हर मुसलमान तालीम हासिल करना चाहता है, अच्छी नौकरी चाहता है, घर चाहता है। मगर मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड ने ऐसी छवि बना रखी है कि मानों मुसलमान सबसे गया गुजरा हो। उसे अपने मजहब के अलावा कुछ परवाह नहीं । जबकि हकीकत में धर्म अपनी-अपनी आस्था का मामला है। जब हम घर से बाहर कदम रखते हैं, तो हम एक आदमी होते हैं। और हमारी वही समस्या है। जो देश के बाकी नागरिकों की है। इस फैसले की बुनियाद पर हमंे उन तमाम मसलों को सुलझाने की ओर बढ़ना होगा। हमारी ख्वाहिश है कि हिंदू विवाह कानून की तर्ज पर देश में एक मुस्लिम परिवार कानून बने। ऐसा कानून जो संविधान के प्रावधानों पर खरा उतरे। इसमें तमाम मसलों की चर्चा हो। मसलन, शादी के लिए औरतों की उम्र 18 और मर्दों की 21 वर्ष होनी चाहिए। बहु पत्नी प्रथा पर भी पाबंदी लगे, हलाला भी एक दंडनीय अपराध घोषित हो, संपत्ति में महिला व पुरूष को बराबर का हक मिले, बच्चों के संरक्षण का अधिकार मर्द और औरत दोनों को बराबर मिले। यानी संविधान के दायरे में ही तमाम चीजें हों। हम कट्टवादी और पितृसत्तात्मक लोगों के मोहताज नहीं रहना चाहती।

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