‘टॉयलेट ..एक प्रेम कथा’ पहली ही फिल्म में ‘बखेड़ा’

अमित राजपूत
नॉर्थ-ईस्ट की शान्ति में भारतीय सेना के वर्ड ऑफ कमाण्ड और जवानों के बूटों की थाप के सिवा एक आर्मी कैण्टोनमेण्ट में समाज के तमाम रंगों से दूर की परवरिश से निकले विक्की प्रसाद आज अपनी उंगलियों से संगीत के तमाम रंगों को बिखेरने के हुनरबाज हो गये हैं। वे आज बॉलीवुड के युवा संगीतकार हैं जिन्होंने इस मायावी इंडस्ट्री की अपनी पहली ही फिल्म ‘टॉयलेट ..एक प्रेम कथा’ में ‘बखेड़ा’ जैसा सुपरहिट गीत देकर अब तमाम युवाओं के चहेते हो गये हैं। इस फिल्म से जुड़ी उनकी चुनौतियां, उनके स्ट्रगल और बहुत सारे अनुभवों के बारे में उनसे बात कर रहे हैं-
छोटी ही उम्र में ‘टॉयलेट ..एक प्रेम कथा’ जैसी बड़ी फिल्म पाकर कैसा अनुभव कर रहे हैं?
(मुस्कुराकर…) बहुत ही बढ़िया महसूस हो रहा है, मेहनत रंग ले आयी है। यही सोच कर आये थे मुम्बई। मुझे लगता है हर किसी म्यूजीशियन का यही सपना होता है कि उसे एक बड़ी एण्ट्री मिल जाये तो क्या कहने। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मुझे नीरज पाण्डेय जी की फिल्म के टाइटल ट्रैक सहित कई गानों के साथ अच्छी शुरुआत करने का मौका मिला। इसे मैं किस्मत ही मानता हूँ क्योंकि इससे अच्छी तो शुरूआत नहीं हो सकती थी। मुझे ऐसी शुरूआत करके खुशी हो रही है।
आपका संगीत से जुड़ाव कब से है ?
मैंने सबसे पहले तीन साल से गाना शुरू किया था। उसे ही संगीत से मेरा जुड़ाव कहा जा सकता है। तब मेरे एक सर थे उनकी फेयरवेल पार्टी में मैंने एक गीत गाया था- ‘चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना।’ तब उन्होंने खुश होकर मुझे पाँच रुपये ईनाम में दिये थे। तब मैं इससे बहुत मोटीवेट हुआ और फिर उसके बाद लगा रहा बहुत कुछ सीखने में। लेकिन सीखने से ज्यादा मैने सुना बहुत अधिक है।
किस सिंगर के साथ काम करना ज्यादा मजेदार रहा ?
सभी के साथ मेरा अच्छा रहा फिर चाहे वो सोनू जी हों, श्रेया मैम हो गयीं या सुनिधि जी हो या फिर चाहे सुखविन्दर जी ही हो। हाँ, सुखविंदर जी और सोनू जी के साथ काफी अच्छा रहा मेरा। उन लोगों से बातें भी होती हैं मेरी। सुखविन्दर जी तो मतलब बहुत मानते हैं मुझे। काफी अच्छे से बात करते हैं वो।
बखेड़ा बहुत ज्यादा पसन्द किया गया हैं !
बखेड़ा मेरे दिल के बहुत ही करीब है। इसके साथ मेरे इमोशन्स भी जुड़े हुए हैं। जब मैं इसे बना रहा था तो इसका मुखड़ा बन गया था। अन्तरें में थोड़ा दिक्कत आ रही थी। कई बार अटका ये गाना। मैं अन्तरा बार-बार करके दे रहा था हर बार वो रिजेक्ट हो जा रहा था। ऐसी भी स्थिति आ गयी थी कि शायद गाना रिजेक्ट भी हो जाता और इसके साथ मैं नहीं जुड़ पाता। लेकिन अन्त में थोड़ा मैं रुका और इस पर फिर से काम किया। इसके बाद जो है वो आप सबके सामने हैं. अच्छा लग रहा है कि लोग इसे सराह रहे हैं। लेकिन फिल्म डायरेक्टर के द्वारा जो मुझे पहला टास्क दिया गया था वो टाइटल ट्रैक था। फिर भी बखेड़ा ही सबसे पहले सेलेक्ट हुआ। इसके बाद मुझे ‘हंस मत पगली’ भी करने का मौका मिला।
बॉलीवुड में कैसे गाने करने की चाहत है ?
देखिए, पहले तो अगर मुझे एक म्यूजिक कम्पोजर के तौर पर आगे काम करना है तो मैं किसी टाइप को लेकर नहीं चल सकता। मैं टाइप्ड होकर कोई अपना जॉनर नहीं सेट करना चाहता कि मुझे यही करना है। मैं करके सीख रहा हूं और मैं यही चाहता हूं कि मुझे सबके साथ तरह-तरह का काम करने को मिले। वैसे भी मुझे सभी टाइप्स के गाने पसन्द हैं। अलग-अलग सिचुएशन में काम करना मुझे पसन्द है। बस हाँ, मुझे किसी भी जॉनर की म्यूजिक करना है तो मैं डिफरेण्ट करना चाहूँगा जोकि मेरा हो, यूनिक हो। यही मेरी तमन्ना है।
इससे पहले कहीं संगीत दिया था ?
वैसे टॉयलेट मेरी पहली ही बॉलीवुड फिल्म है। इससे पहले मैने ध्रुव हर्ष की ‘ऑनरेबल मेन्शन’ की थी। ध्रुव मेरे कॉलेजमेट हैं। उनकी ये मूवी आधे घण्टे की शॉर्ट फिल्म थी। उन दिनों भी मैं मुम्बई में था। वो ये फिल्म इलाहाबाद में कर रहे थे। ध्रुव ने कहा कि मैने एक शॉर्ट फिल्म बनाई है। बहुत मेहनत हुई है इसमें। मैने कहा ठीक है, करते हैं भेजो। फिर उसकी थीम पर काम करके ध्रुव के साथ बहुत मजा आया। फिल्म ने यूएसए में 2 और हैदराबाद, कोलकाता, इलाहाबाद और नई दिल्ली में 1-1 अवॉर्ड हासिल किये हैं। आगे भी हम साथ काम करने वाले हैं।
रिकॉर्डिंग्स के दौरान के अनुभव कैसे रहे ?
जैसा कि मेरी शुरुआत थी और सोनू निगम जी, सुखविन्दर जी जैसे बड़े दिग्गज मेरा गाना कर रहे थे तो वाकई मैं बड़ा ऑनर फील कर रहा था उस वक्त। अक्षय कुमार जी के साथ रिकॉर्ड करने में सबसे ज्यादा मजा आया। वो बड़े मस्त इन्सान हैं। हमेशा खुश रहते हैं। एक पॉजिटिव माहौल बना देते हैं। खूब हंसी-मजाक करते हैं। वो बहुत ही ज्यादा एनर्जेटिक हैं, उनको देखकर आप ऑटोमैटिक डेडीकेटेड हो जाते हो।
घर में कौन-घर में कौन कौन हैं आपके ?
मेरे फादर नहीं हैं। परिवार के अधिकतर लोग असम में ही रहते हैं। फादर की डेथ के बाद मेरी नानी जी ने मेरी परवरिश की। वो आर्मी में हैं। मेरा जन्म भी असम राइफल्स में ही हुआ है। पूरे नॉर्थ-ईस्ट में ही घूम-घूमकर उनका ट्रान्सफर होता रहता और वैसे ही घूम-घूमकर मेरी पढ़ाई चलती रही। 2005 तक मैं वहीं था। इस तरह से मेरी पूरी परवरिश आर्मी एटमॉसफियर के बीच ही हुई।
विक्की आपके आगे के क्या प्लान हैं ?
ध्रुव हर्ष की ही फिल्म ‘हर्षित’ करने वाला हूं। वो वर्ल्ड सिनेमा के बड़े अच्छे फिल्मकार हैं। हर्षित हेमलेट पर बेस्ड फिल्म है। इसके अलावा मैने एक फिल्म कम्प्लीट कर ली है, उसका नाम है- ‘चेन्ज ऑफ वर’। ये बड़ी फनी मूवी है। हालांकि इनमें फन के अलावा बहुत अच्छा ड्रामा है, इमोशन है और काफी खूबसूरत सी फिल्म है। संजय मिश्रा जी इसमें लीड रोल कर रहे हैं। इसके अलावा भी काफी अच्छे-अच्छे कलाकारों से सजी मूवी है ये। ये फिल्म मथुरा पर बेस्ड है। इससे भी मुझे बड़ी उम्मीदे हैं। बहुत जमकर काम हुआ है इसमें भी। इसके अलावा 2-3 प्रोजेक्ट्स पर बात फाइनल होने वाली है मेरी।
अपने स्ट्रगल के बारे में कुछ बातें साझा कीजिए ?
12वीं से ही मुझे पता था कि अल्टीमेटली एक दिन मुझे बॉलीवुड में ही काम करना था। इसलिए यही कारण रहा कि सबसे पहले मैं नॉर्थ-ईस्ट से निकलकर इलाहाबाद पहुँचा। वहां रहकर मैने पढ़ाई की और बहुत सारी चीजे तभी से सीखने लगा। फिर मुम्बई आ गया। यहां मुम्बई में मेरी कोई जान-पहचान भी नहीं थी कि कोई मुझे कहीं काम दिलवाता। मैंने खुद से कई जगह हाथ-पैर मारे पर कोई बात बनी नहीं। अब तक मेरे सारे पैसे खत्म हो चुके थे। फिर मजबूरी में मुझे कोई जॉब करनी पड़ी और मैने की थी। लेकिन चूंकि मैंने तय ही कर रखा था कि मुझे जीवन में जॉब नहीं करनी। एक पैसा भी कमाना है तो वो म्यूजिक से कमाना है। इसलिए मैने जॉब छोड़ दी और म्यूजिक अरेंजमेण्ट का काम करने लगा, वहीं से अब मेरे रहने खाने का जुगाड़ चलता रहा। वास्तव में ये सब भी मैं करना नहीं चाह रहा था लेकिन मजबूरी थी। मैं म्यूजिक कम्पोज करना चाहता था। साल 2013-14 का जो पीरियड था वो मेरे लिए बड़ा मुश्किल भरा था। कुछ प्रोजेक्ट छूट गये थे, मेरे पास कोई काम भी नहीं था। रेण्ट देने के पैसे नहीं थे, जो पैसे थे बिल्कुल खतम होने वाले थे। उन दिनों मैं इधर कांदीवली में रहता था, रेण्ट डिपॉजिट के दिए हुए पैसे से ही मैं सर्वाइव कर रहा था। कोई उधार देने वाला भी अब न था, सबसे ले चुका था। अब मेरे पास खाने के लिए भी पैसा नहीं था। 10 रुपये रहते तो उसी से दिन में पाव खाकर रहता था। बड़ा मुश्किल हो गया था उन दिनों। सारे रास्ते बंद थे। अन्त में अचानक से एक दिन मेरे कॉलेज फ्रेण्ड आशुतोष त्रिपाठी ने मुझे कॉल कर दी। उसने मेरी हालत समझी और फिर 2500 रुपये खाते में डाल दिया। उसी पैसे से मैं वापस घर गया। मॉम से मिले भी चार साल से ज्यादा हो गए थे।
घर जाते ही 10-15 दिन बाद मुझे एक क्लाइंट का फोन आता है और वो मुझसे कुछ काम लेना चाहते थे। मैने उन्हें काम करने की शर्त यही दे दी कि मेरे रहने का जुगाड़ कर पाओ तभी मैं आऊँगा। वो राजी हो गये और मैं जल्दी ही मुम्बई वापस आया। उन्हीं की बदौलत मैं वापस मुम्बई में स्टैण्ड कर गया। आज वो मेरे बड़े अच्छे दोस्त हैं, अजय आर्य नाम है उनका। तब से लेकर 2016 तक मेरा संघर्ष जारी था। इसके बाद कामयाबी मिली।
बॉलीवुड में आकर संगीतकार बनने की चाह रखने वालों के लिए कोई सलाह ?
मैं अभी किसी को सीख देने के काबिल खुद को नहीं मानता। लेकिन मेरी जो सोच है मैं उसे साझा कर सकता हूँ आप किसी भी विधा में काम करे हों सबसे पहले तो आपको अपनी आइडेण्टिटी बनाने की जरूरत होगी। उसे ही लेकर आप चलते रहो वरना उसके बिना आप भीड़ का हिस्सा हो जाते हो और फिर आपको कोई नहीं पूछता है। भीड़ कब हट जाती है पता भी नहीं चलता आपको, हताशा होती है। इसलिए मेहनत के साथ सकारात्मक रहकर डटे रहना हर किसी के लिए बहुत जरूरी है। इसके अलावा धैर्य एक बहुत जरूरी चीज है, उसके बिना कुछ सम्भव नहीं।

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