एक घातक निर्णय का हासिल क्या है ?

नोटबंदी और जीएसटी की असलियत

इन खबरों ने देशवासियों को व्यग्र कर दिया है कि इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी की वृद्धि दर को गहरा झटका लगा है, और नोटबंदी की धोषणा के बाद चलन से बाहर की गई करीब-करीब समूची करंसी वापस बैंकों के पास लौट आई है। तो मतलब यह कि आर्थिक गतिविधियों में इस कदर शिथिलता आई कि जीडीपी की वृद्धि दर में कमी दर्ज हुई। ये दोनों बातेें देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे संकेत नहीं माने जा सकते। नोटबंदी का फैसला इसीलिए हुआ बताया गया था कि इससे भ्रष्टाचार और काले धन से निजात मिलेगी। लेकिन इन उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हुई। इसी प्रकार, जीडीपी की वृद्धि दर जो अर्थव्यवस्था की मजबूती का पैमाना मानी जाती है, का डुबकी लगा जाना मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की कमजोरी की तरफ इंगित करता है। यह सरकार को चेताने वाला घटनाक्रम भी है कि समय रहते वह अर्थव्यवस्था की मजबूती की दिशा में मुस्तैद हो जाए।

प्रभात पटनायक

महीनों टाल-मटोल के बाद भारतीय रिजर्व बैंक ने आखिरकार यह आंकड़ा पेश कर दिया कि 2016 के नवम्बर में जिन नोटों पर नोटबंदी लगाई गई थी, उनमें से करीब 99 फीसद बैंकिंग व्यवस्था में लौट आए थे। 500 तथा 1000 रूपये के नोटों में कुल 15.44 करोड़ रूपये की मुद्रा की नोटबंदी की गई थी, और इसमें से 15.28 लाख करोड़ रूपये के ये नोट बैंकिंग व्यवस्था में लौट आए थे, जो नोटबंदी की गई राशि का 98.96 फीसद होता है। चूंकि नोटबंदीशुदा मुद्रा के लौटने की कुछ छोटी-छोटी खिड़कियाँ अब भी खुली हुई हैं, इसका अंतिम आंकड़ा निश्चित रूप से 99 फीसद से ऊपर निकल जाने वाला है। इससे सरकार का दावा झूठा साबित हो जाता है कि नोटबंदी से काली अर्थव्यवस्था पंगु होकर रह जाएगी।
याद रहे कि यह दावा इस तर्क पर आधारित था कि नोटबंदी के बाद ईमानदार लोग तो आराम से अपनी नकदी बैंक में जमा करा देंगे, लेकिन काली अर्थवयवस्था चलाने वालों में बैंकों में अपनी नकदी जमा कराने की हिम्मत ही नहीं पडेगी। उन्हें डर होगा कि जब बैंकों में अपनी नकदी जमा कराने जाएंगे तो उन्हें सवाल का जवाब देना होगा कि यह नकदी उनके पास कहाँ से आई? इस पूरे के पूरे तर्क का बेतुकापन अब पूरी तरह से बेनकाब हो गया है। इस तर्क के अनुसार, काले धन की अर्थव्यवस्था पर अंकुश लगाने में नोटबंदी की सफलता की निशानी यही होगी कि नोटबंदीशुदा मुद्रा लौटकर बैंकिंग व्यवस्था में आएगी ही नहीं। उस समय 3.5 लाख करोड़ रूपये का एक आंकड़ा पेश किया जा रहा था कि सरकार को उम्मीद थी कि इतने रूपये की काली मुद्रा बैंकिंग प्रणाली में लौटकर ही नहीं आएगी। वास्तव में इसी प्रत्याशा के आधार पर उस समय भांति-भांति के दावे भी किए गए जा रहे थे। कहा जा रहा था कि इस राशि को सीधे-सीधे जनता के बीच बांटा जा सकता है क्योंकि इतनी राशि की मुद्रा चक्र से बाहर हो जाने से रिजर्व बैंक की देनदारियां घट जाएंगी और सरकार बिना किसी अतिरिक्त बोझ के इतनी राशि की नई मुद्रा छापकर इस राशि को खर्च कर सकती है। वैकल्पिक संभावना के तौर पर सुझाया जा रहा था कि यह राशि सीधे-सीधे सरकार को बजट के जरिए खर्च करने के लिए दी जा सकती है, और इसके लिए सरकार को कोई अतिरिक्त कर्जा रिजर्व बैंक से नहीं लेना पड़ रहा होगा, आदि-आदि। लेकिन अब पता चल रहा है कि बैंकिंग व्यवस्था में अब तक नहीं लौटी मुद्रा सिर्फ 16,000 करोड़ रूपये की बैठती है, और इसमें से ज्यादा रकम ऐसे ईमानदार लोगों की जेब से आई है, जो सरकार द्वारा तय की गई अंतिम तिथि तथा अपने पुराने नोट किसी न किसी कारण से जमा नहीं करा पाए थे। दूसरे शब्दों में, यह सीधे-सीधे ईमानदार लोगों को सरकार द्वारा लूटे जाने का मामला है।

इस तुगलकी फरमान से घाटा पर गया रिजर्व बैंक:

यह किस्सा इतने पर भी खत्म नहीं होता। रिजर्व बैंक को जो नई मुद्रा छपवानी पड़ी है, उसका खर्च और बैंकों में लोगों द्वारा इस तरह जमा कराई गई, आवंछित नकदी को बटोरने के लिए, क्योंकि बैंकों को इससे कोई कमाई नहीं हो रही थी, जबकि इस नकदी पर उन्हंें खाताधारकों को ब्याज देना पड़ रहा था, रिजर्व बैंक को रिवर्स रेपो गतिविधियों का जो सहारा लेना पड़ रहा था, उसका खर्चा मिलाकर, 30,000 करोड़ रूपये बैठता है। यह रकम जनता से छीनी गई 16,000 करोड़ रूपये की राशि से काफी ज्यादा है। जिस रिजर्व बैंक ने नोटबंदी के चलते मालामाल हो जाने की बातें कही जा रही थीं, इस पूरी कसरत में अच्छा-खासा घाटा खा बैठा है, और सरकार को राजस्व की हानि हुई है।
इस तरह बिना किसी तुक या कारण के देश की अर्थव्यवस्था को बहुत भारी झटका दे दिया गया। इससे अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर बहुत भारी प्रहार हुआ। इससे मजदूरों के सबसे गरीब हिस्से के बीच बेरोजगारी और बढ़ गई। इससे आम आदमी को भारी तकलीफें झेलनी पड़ी, जिन्हें बैंकों में जमा अपनी कमाई का एक छोटा सा हिस्सा हासिल करने के लिए भी अंतहीन कतारों में लगना पड़ रहा था। इससे 103 लोगों की अकाल मौतें हुई। और इससे राजस्व संसाधनों की शुद्ध हानि हुई है। इस सबके लिए जो यह बहाना बनाया गया था कि इससे काले धन की कमर टूट जाएगी, शुरूआत से ही झूठा नजर आ रहा था, और अब तो खुद रिजर्व बैंक के आंकड़े ने उसके झूठे होने का सबूत पेश कर दिया है।लेकिन लगता है कि इस सरकार की धृष्टता की तो कोई सीमा ही नहीं है। वित मंत्री अरूण जेटली, जो पहले इसकी शेखी मारते नहीं थकते थे कि नोटबंदी से कितनी भारी राशि बेकार हो जाने की उम्मीद की जा रही थी, अब पूरी तरह से पलट गए हैं। अब इस पर तालियाँ बजा रहे हैं कि कितना कम पैसा बैंकिंग व्यवस्था में न लौटने के जरिए बेकार हुआ है। दावा कर रहे हैं कि नोटबंदी की कामयाबी इसमें नहीं है कि कितनी रकम बैंकों में लौटकर नहीं आती है, बल्कि इसमें है कि यह राशि बैंकिंग व्यवस्था में लौटकर आ गई है। अब उनका कहना है कि नोटबंदी काले धन के खिलाड़ियों की नकदी को बाहर निकलवाने में कामयाब हुई है, और उन्हें अपनी नकदी बैंकों में जमा करनी पड़ी है।

कालेधन की अर्थव्यवस्था पर रत्ती भर चोट नहीं

अब अगर काले धन के खिलाड़ी अपने पुराने नोट, नये नोटों से बदलवाने में ही कामयाब हो गए हैं, तो जाहिर है कि इससे काले धन की अर्थव्यवस्था पर रत्ती भर चोट नहीं पड़ने जा रही। फिर भी अगर दो शर्तें पूरी हो रहीं होतीं, तब तो फिर भी माना जा सकता था कि जेटली के तर्क का कुछ आधार है। पहली शर्त यह कि काले धन के खिलाड़ियों को पुराने नोट जमा करने पर बदले में नये नोट नहीं मिल रहे हों। दूसरी शर्त यह कि काली कमाई के लिए केवल नकदी में लेन-देन जरूरी हो। लेकिन इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती। सिर्फ काले धन के खिलाड़ियों से पुरानी नकदी निकलवाने भर से कोई फर्क नहीं पड़ता है। फर्क पड़ता है तो सिर्फ इससे कि क्या इस तरह नकदी निकलवाए जाने से काली अर्थव्यवस्था के लिए नकदी की ऐसी तंगी होने जा रही है, जो किसी हद तक उसे पंगु बनाती है। लेकिन सरकार का आर्थिक सर्वे कहता है कि नकदी की ऐसी कोई तंगी तो है ही नहीं। इसका अर्थ है कि हम जेटली की दलील में अतिरिक्त रूप से कुछ तुक डालने की कोशिश भी करें तो भी इस दलील की कोई तुक नहीं बैठती है। जाहिर है कि यह दलील नोटबंदी की उस सच्चाई पर पर्दा डालने की बदहवास कोशिश में दी गई है, जो एक शर्मिदा करने वाले रहस्योद्घाटन के रूप में सरकार के सामने आकर खड़ी हुई है।
(लेखक प्रख्यात अर्थशास्त्री)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *