यह प्रधानमंत्री की स्वेच्छाचारिता और निरंकुशता की पराकाष्ठा है…

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भारत के प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार को भगाने के नाम पर, काला धन को लाने के नाम पर, नकली नोटों को मुद्रित होने से रोकने के नाम पर, कागजी करेन्सी की बन्दी और बदली का जो काम किया है, उसको अर्थशास्त्र की दृष्टि से मूर्खतापूर्ण कहा जायेगा, राजनीति की दृष्टि से मक्कारी से परिपूर्ण कहा जायेगा, जबकि लोकतंत्र की दृष्टि से स्वेच्छाचारिता और निरंकुशता की पराकाष्ठा

-दीनपाल राय-

अर्थशास्त्र के अनुसार ‘कागजी करेन्सी’ केवल विनिमय का माध्यम है, मूल्य का मान, माप और भारवाहक है, अर्थ की सारी वस्तुओं का क्रय और विक्रय करने का केवल माध्यम है, अर्थ की सारी सेवाओं को आदान प्रदान करने का केवल माध्यम है द्य देश की सारी जनता की सारी आर्थिक सेवाओं की आपूर्ति और संतुष्टि करने के लिये, कागजी करेन्सी को अस्तित्व में लाया गया है द्य परन्तु अर्थशास्त्र की अज्ञानता और अनभिज्ञता के कारण कागजी करेन्सी के जरिये देश की सारी जनता का आर्थिक शोषण और वित्तीय उत्पीड़न किया जा रहा है। जनता की सारी आर्थिक सेवाओं को करने के कारण, कागजी करेन्सी को ‘धन’ कहा जाता है द्य धन, अर्थ की सारी वस्तुओं और अर्थ की सारी सेवाओं से उत्पादकों और उपभोक्ताओं को निरन्तर जोड़ता रहता है । अर्थशास्त्र के अनुसार ‘धन’ माने ‘कागजी करेंसी’, देश की सारी जनता के आर्थिक जीवन का सिर्फ ‘साधन’ है और ‘सेवक’ है। धन माने कागजी करेन्सी, जनता के आर्थिक जीवन का ‘साध्य और स्वामी’ नहीं है। कागजी करेन्सी, जब जनता के आर्थिक जीवन में सिर्फ ‘साधन और सेवक’ के रूप में रहेगी तब देश के भीतर कोई भी व्यक्ति, बेकार, बेरोजगार, निर्धन, गरीब, कंगाल और कर्जदार कभी नहीं रहेगा, न किसी प्रकार का अभाव, अपराध और भ्रष्टाचार रहेगा। कागजी करेन्सी, जब जनता के आर्थिक जीवन का ‘साध्य और स्वामी’ बन जायेगी तब देश के भीतर बेकारी, बेरोजगारी, निर्धनता, गरीबी, कंगाली, कर्जदारी रहेगी और प्रत्येक प्रकार का अभाव, अपराध और भ्रष्टाचार रहेगा। भारत सरकार की वित्तीय व्यवस्था ने अर्थशास्त्र के वैज्ञानिक सिद्धान्तों के प्रतिकूल ‘कागजी करेंसी’ को भारतराष्ट्र की सारी जनता के आर्थिक जीवन का ‘साध्य और स्वामी’ बना दिया है। भारत सरकार की वित्तीय व्यवस्था के निर्माण के सिद्धान्त का आधार, अर्थशास्त्र नहीं है, बल्कि आधुनिक अर्थशास्त्र है। इस प्रकार भारत के भीतर, बेकारी, बेरोजगारी, निर्धनता, गरीबी, कंगाली, कर्जदारी तथा अभाव, अपराध और भ्रष्टाचार का मुख्य कारण, भारत सरकार की वित्तीय व्यवस्था है और मूल कारण, आधुनिक अर्थशास्त्र है।
भारत सरकार के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने भ्रष्टाचार को भगाने के नाम पर, काला धन को लाने के नाम पर, नकली नोटों को मुद्रित होने से रोकने के नाम पर, कागजी करेन्सी की बन्दी और बदली का जो काम किया है, उसको अर्थशास्त्र की दृष्टि से मूर्खतापूर्ण कहा जायेगा, राजनीति की दृष्टि से मक्कारी से परिपूर्ण कहा जायेगा, लोकतंत्र की दृष्टि से स्वेच्छाचारिता और निरंकुशता की पराकाष्ठा कहा जायेगा। कागजी करेन्सी की बन्दी और बदली से न तो भ्रष्टाचार बन्द हुआ, न काला धन देश में वापस आया, न नकली नोटों का मुद्रित होना रुका ।
अर्थशास्त्र के अनुसार ‘कागजी करेन्सी’ की बन्दी और बदली का काम, अतिआवश्यक है और अनिवार्य भी है। परन्तु इस काम को करने के लिये प्रधानमंत्री मोदी जी को, किसी अर्थशास्त्री की शरण में जाना पड़ेगा। भारत के तथाकथित अर्थशास्त्री, इकोनामिस्ट हैं, माने धनशास्त्री हैं, कदापि अर्थशास्त्री नहीं हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व और वर्तमान् सारे गवर्नर, इकोनामिस्ट हैं, धनशास्त्री हैं, कदापि अर्थशास्त्री नहीं हैं। माडर्न इकोनामिक्स, आधुनिक अर्थशास्त्र नहीं है, आधुनिक धनशास्त्र भी नहीं है, अनर्थशास्त्र है। भारत सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह जी, जो कभी भारत सरकार के वित्तमंत्री और भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर तथा विश्व बैंक के भी पदाधिकारी रहें हैं, संसार के बहुत बड़े अनर्थशास्त्री हैं।

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