हादसा या बालसंहार ?

यह एक हृदयस्पर्शी कविता भर नहीं है, और नहीं सबसे नौजवान देश के मासूम बचपन की टूट चुकी सांसों की डोर पर गायी गयी मर्सिया है। और नहीं हमारी सभ्यता की मौत पर पढ़ी गयी राजसत्ता ही फातिहा। बल्कि यह हमारे समय की निर्लज्जता, राजसत्ता और समाज की सुख चुकी संवेदना, और उसकी (अ)विकसित सभ्यता का शोकगीत है। जिसे ‘कल्पना झा’ ने अपनीे इस कविता में उतार कर, समय और संवेदना की आंखें तक नम कर दी हैं।

-कल्पना झा
‘‘दूध के डब्बे में थोड़ा दूध अब भी बचा है/बोतल में बासी दूध के टुकड़े जमे हैं,
छोटी गिलास छोटी प्याली पर उल्टी पड़ी है/तस्वीरों से झाँक रही उनकी किलकारी है,
तबियत बिगड़ी है बबुआ की/लौटेगी मुन्नी जल्दी ही/आस टूटती नहीं इनकी,
खिलौने वाली गुड़िया नहीं पी रही पानी/गुड्डा आकर पिलायेगा/वही अपने साथ नहलायेगा,
अंचरा कब से भीग रहा/छुटकू तकिया कब से बिन लार के सूख रहा/
पिपही नन्हीं फूँक के इंतजार में /किसी कोने में पड़ी सुबक रही/
बंसुरिया छोटी उंगलियों को रो रही/छोटी हवाई चप्पल केवाड़ के पीछे दुबकी है रे,
गेंद चैकिया के नीचे छुपी है/चार चार बित्ते के कपड़े रंग छोड़ रहे,
लंगोट टंगे हैं कब से बाहर/दिठौना लगाने को कजरौटा भी खुला पड़ा है,
हिसाब माँगते हैं सब तुमसे/माटी लाल हो रही है/क़ब्रगाह विरोध पर अड़े हैं,
लकड़िया जलने को मना करती है/लपट उठना नहीं चाहती/तुमको शर्म मगर आती नहीं,
तुमको आँसू मगर आते नहीं’’

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