तो मेरे जिले का कलेक्टर सेवाभाव को इतना सीमित आंकता है ?

(व्यंग्य) संदर्भ: #पद्मश्री

आलोचना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है

अरविंद सिंह
◆रामखेलावन को जयसिंह यादव के नाम को पद्मश्री के लिए नामित होने से बहुत तकलीफ है। वह बेचारा इस असहनीय पीड़ा से बेजार कभी सरकार को तो, कभी कलेक्टर साहेब को कोसता है और कभी अपनी फूटी किस्मत पर रोने लगता है। कभी बला की ताकत मुर्दों से भी अपनी पैरवी करने की मुहिम चलाने की बात करता है। इस सदमें के साथ कि ‘क्या मुझे सरकार का कोई सम्मान नहीं मिल सकता है’।फिर मेरे अंदर क्या कमी है।मैने जीवन भर कर्म को पूजा मानकर लोगो की सेवा की। यदि पाखाना भी साफ किया तो उसे भी ऐसी तन्मयता से किया मानों-‘प्रेमचंद अपनी सर्वश्रेष्ठ कहानियां रच रहें हों, रस्किन बांड प्रकृति के अनिंद्य सौंदर्य को अपलक निहार रहे हों,मैक्सिम गौर्की ‘माँ’ की कथाभूमि तैयार रहें रहे हों,जयशंकर प्रसाद ‘कामायिनी’ व बच्चन ‘मधुशाला’ के भावों और शब्दों को संजों रहें हों,न्युटन प्रकृति के गुरुत्वाकर्षण के भेद को खोल रहें हों,सुकरात अपनी धारणा की सिद्धि के लिए ज़हर का प्याला पी रहा हो, और गांधी ‘सत्य के प्रयोग’ कर रहे हों। मैंने जीवन भर गीता के उपदेश के अनुसार कृष्ण के ‘निष्काम कर्म’ का पालन किया लेकिन बदले में मिला क्या?बेचारा! बेचारा बहुत ईमानदार है। यानि अब तो ईमानदारी को भी बेचारगी के ही आवरण का सहारा बचा है।
इस बेचारे की बेचारगी ने इसके ऊपर जैसे नैतिकता का हिमालय ही लाद दिया हो। और वह समुद्र की तरह शांत उसे अपनी नियति ही मान बैठा हो। लेकिन आज के लौडों के आभामंडल ने उसके विश्वास को डिगा दिया है।अब तो उम्र के इस पड़ाव पर उसकी सेवाओं के बदले जब समाज से सम्मान का एक माला तक नसीब नहीं हुआ तो उसका धैर्य और गीता का सार, दोनो ‘कमजोर की लुगाई,सगरों गांव की भौजाई’ की तरह जवाब दे जाते हैं। वह कुढ़ता है कि आखिर डाक्टर जय यादव, जो अब सरकार बदलने के साथ जय और यादव के बीच ‘सिंह’ भी बन चुका है,मुझसे किन मामलों में आगे है, वह तो जुम्मा जुम्मा 9-10 बरस से ही डाक्टरी कर रहा है और कुनबे सहित मेवा खा रहा है। वो क्या जाने सेवा,एनजीओ और चौराहों से मीडिया मेंं सिर्फ प्रोपोेगेंडा हो सकता है,सेवा नहीं। सेवा तो एक भाव है जो बारिश की बूंदों की तरह होती है, वह तो अंतर आत्मा की आवाज है,जिसे पदार्थ से नहीं करूणा से लगाव होता,बिल्कुल मदर टरेसा की मानवता की सेवा और गांधी के अछुतोद्धार जैसे। काशी के डाक्टर लहरी और विवेक शर्मा जैसे । मेरे बगल के डाँ०घुरहु जैसे।
यह खेलावन अपनी अबोली पीड़ा पर भावुक होकर पूछता है कि-‘मेरे नगर का कोई आदमी अपने दिल पर हाथ रहकर यह बता दें कि मेरे नगर का कौन सा चिकित्सक मानवता की सेवा के लिए इस पेशे में आया है। और बिना पैसे का इलाज करता है’; अरे बाबा! ये तो ऐसे डाक्टर हैं जो मुर्दों से भी पैसे वसूल करने की विद्या में पारंगत हैं।बिना फीस चुकाएं तो वे लाश तक छूने नहीं देते हैं।’ उनकी सालों साल बढ़ती अट्टालिकाएं और जमीनों के टुकडे़ उनकी सेवाभाव की कितनी वीभत्स कहानी बयां करती है,उसे मेरा दिल ही समझता है। खेलावन यही नहीं रूकता,उसका गुबार क्या फूटा,वह ज्वालामुखी का लावा बन गया, बोला जिला अस्पताल में 30 बरस सफाई का काम किया। पाखाना साफ किया। मेरे काम और डीग्री ने मुझे मर्चुरी हाउस तक पहुँचा दिया। पिछले 25 सालों से डाक्टरों के साथ ईमानदारी से मुर्दों की खोपडी़ खोलता हूँ,पेट फाडता हूँ,आंख -कान -मुँह को ऐसे विच्छेद करता हूँ जैसे किसी सर्जन का सधा हाथ हो। मेरे शव-विच्छेदन की रिपोर्ट पर कानून की धाराएं बदल जाती हैं। कानून के मायने बदल जाते हैं। मेरे ऊपर पुलिस और पब्लिक सभी का दबाव रहता है । लेकिन अपना काम ईमानदारी से ऐसे करता हूँ जैसे उसे करने के लिए मेरे पास अंतिम अवसर है,और मेरे आँखों में न्याय की देवी का पट्टी बँधा हो। मेरी ईमानदारी और कर्तव्य परायणता को आखिर मिला क्या, निरा ‘बेचारगी’ वो भी दया का पात्र बना कर। मैं तब भी नहीं बोलता और इसे अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लेता। लेकिन मेरे अंदर का हिंद महासागर तब जापान का ज्वालामुखी बन गया,जब मेरे जिले का कलेक्टर ‘सेवाभाव’ के अर्थ को इतने सीमित करके आंकना शुरू कर देता है और 60 लाख की आबादी में से उसका तंत्र एक अदद पद्मश्री का नाम नहीं ढुढ पाता है जिससे मानवता और सेवाभाव को सम्मान मिल सके। अरे ! मेरा नाम पद्मश्री के लिए भले ही प्रस्तावित नहीं करते लेकिन एक पात्र ‘पद्मश्री’ तो ढूढ लेते।यह राहुल का जिला है जिसने ढुढते-2 जीवन ही खपा दिया और जो दिया उसकी रौशनाई में आज दुनिया पद्मश्री और यशभारती बन जाती है।

(हृदयरोग के मरीज कृपया न पढ़ें,आलोचक शत्रु नहीं है)

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