मुख्यमंत्री जी! करोड़ों की ‘भाषा निधि’ कहां गयी ?

-ः मुख्यमंत्री के विभाग में उदासीनता:
इस धनराशि के बारे में न तो प्रमुख सचिव-भाषा ने कुछ बताने की ज़हमत उठाई और नहीं उनका भाषा विभाग। मुख्यमंत्री के इस विभाग ने इस ‘फंड’ का क्या किया। इसकी जानकारी क्या मुख्यमंत्री को है, यह सवाल अखिलेशराज में भी निरूत्तर था और आज योगीराज में भी है? निजा़म बदला लेकिन सवाल नहीं…।

-ः अरविन्द कुमार सिंह:-

दस करोड़ की लागत से बनी ‘उ.प्र.भाषा निधि’ का क्या हुआ? इसका जवाब सरकार या उसके नुमाइन्दों के पास है? इस सवाल को ‘शार्प रिपोर्टर’ ने अखिलेश सरकार में भी उठाया था (मार्च-अप्रैल-2015 अंक में ‘मुख्यमंत्री जी! करोड़ों की भाषा निधि कहां गयी’ व सितम्बर-2015 अंक में ‘चुप क्यों है सरकार’)। आज एक बार फिर जबकि सूबे का निजा़म बदल चुका है और नया निज़ाम योगीराज का है, जिन्होंने भ्रष्टाचार को समूल नाश करने का दावा किया है। एक बार फिर उसी तासीर के साथ उन सवालों को उठाया जा रहा है।
बताते चलें कि उ.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अपने कार्यकाल में भारतीय भाषाओं और साहित्य की अनुषांगिक संगठनों को समृद्ध करने के लिए 10 करोड़ की धनराशि से ‘उ.प्र. भाषा निधि’ को स्थापित किया था। इस निधि को स्थापित करने का उद्देश्य यह था कि ‘उ.प्र. में साहित्य, संस्कृति और भाषाओं की समृद्धि में संलग्न सरकारी स्वायत्तशासी संस्थाओं को अनुदानित एवं वित्तपोषित किया जाये। धनाभाव के कारण ऐसी संस्थाएं असमय मरे नहीं, बल्कि साहित्य और संस्कृति को निर्बाध गति से उसका समृद्ध परिवेश और लय मिलता रहे, था।’ इस महापरियोजना को विधिवत आकार देने वाले साहित्य अनुरागी सिसायतदांओं और तत्कालीन नौकरशाहों ने इसके लिए एक सटीक विधान भी बनाया था। उक्त विधान के अनुसार ‘भाषा निधि’ को उ.प्र. सरकार के विभिन्न उपक्रमों, विभागों, अर्धसरकारी संगठनों, इकाईयों को ऋण स्वरुप देकर बदले में उनसे ब्याज लिया जायेगा और ब्याज की धनराशि को भाषा व साहित्य की संस्थाओं के विकास एवं समृद्धि में लगाया जायेगा। जिससे कि ये संस्थाएं अपनेे उद्देश्यों के साथ निर्बाध गति से चलती रहें।
सरकार के ‘भाषा विभाग’ के नाम आरक्षित इस ‘फण्ड’ का क्या हुआ? किस संस्था को कितना ऋण दिया गया और किससे कितना ब्याज प्राप्त हुआ? इसकी ख़बर क्या उ.प्र. भाषा विभाग या इसके मंत्री(मुख्यमंत्री) को है। ‘शार्प रिपोर्टर’ ने इस निधि की ख़बर लेने की कोशिश जरुर की। उ.प्र.के भाषा विभाग से हमने सूचना के अधिकार के अन्तर्गत जानकारी चाही और व्यक्तिगत पत्र भेज कर भी, लेकिन इस धनराशि के बारे में (इन पंक्तियों के लिखे जाने तक) न तो प्रमुख सचिव-भाषा ने कुछ बताने की ज़हमत उठाई और नहीं उनका विभाग। मुख्यमंत्री के इस विभाग ने इस ‘फण्ड’ का क्या किया। इसकी जानकारी क्या मुख्यमंत्री को है, यह सवाल तब भी निरूत्तर था और आज भी है?
‘शार्प रिपोर्टर’ के पास मौजूद रिकार्ड के अनुसार उ.प्र.शासन के भाषा अनुभाग-1, के एक पत्र के अनुसार 27 दिसम्बर 2006 को तत्कालीन मुख्यसचिव की अध्यक्षता में एक बैठक सम्पन्न हुई थी जिसमें प्रमुख सचिव वित्त-शेखर गुप्ता (तत्कालीन), मंजीत सिंह-प्रमुख सचिव वित्त,अशोक घोष-प्रमुख सचिव-भाषा (तत्कालीन), उमेश सिन्हा सचिव-कार्मिक (तत्कालीन), सुधीर गर्ग-प्रबंध निदेशक-पिकप (तत्कालीन), पी.एन.यादव- विशेष सचिव-कार्मिक, पी.के मिश्र विशेष सचिव-भाषा (तत्कालीन) और पी.के.पाण्डेय-संयुक्त सचिव, भाषा (तत्कालीन) भी उपस्थित होकर कार्यवाही में भाग लिये थे। बैठक की कार्यवृत्त के अनुसार, ‘‘पिकप, लखनऊ को उद्योग विभाग के शासनादेश संख्या-842 दिनांक 12 फरवरी 1993 द्वारा ढ़ाई करोड़ की धनराशि ‘उ.प्र. भाषानिधि’ से ऋण स्वरुप स्वीकृत की गयी थी। उक्त शासनादेशों की शर्ताे के अनुसार ऋण पर ब्याज की दर 15 प्रतिशत वार्षिक थी तथा ब्याज का भुगतान ऋण आहरण की तिथि से छमाही किस्तों में किया जाना अपेक्षित था।’’
बताते चलें कि इसी कार्यवृत्त में आगे बताया जाता है कि ‘पिकप’ द्वारा शासनादेश के अनुसार 7.5 करोड़ की धनराशि निर्धारित हेड में ब्याज के रुप में जमा कर दी गयी। परन्तु उसके बाद उनके द्वारा ब्याज की अदायगी बन्द कर दी गयी और वर्तमान (27 दिसम्बर-2006 तक) में पिकप संस्था पर 7.5 करोड़ की धनराशि ब्याज के रुप में तथा 7.5 करोड़ मूलधन की धनराशि देय हो गयी है। अर्थात दिसम्बर-2006 में भाषा निधि का 15 करोड़ रुपये केवल पिकप पर बकाया था। बैठक में मुख्य सचिव ने निर्णय लिया था कि ब्याज की धनराशि पिकप द्वारा प्रत्येक दशा में जमा करा दिया जाये, जिस पर वित्त सचिव द्वारा सहमति व्यक्त की गयी थी। इस बैठक में भाषा विभाग द्वारा कहा गया था यदि ब्याज की अदायगी समय से की जाती हैं तो मूलधन पिकप के पास रहने में हमें कोई आपत्ति नहीं होगी। वहीं उ.प्र.राज्य औद्योगिक विकास निगम को ऋण के रुप में भी 7.5 करोड़ की धनराशि ‘‘भाषा निधि’’ से दी गयी थी।
यदि सरकारी कार्यवृत्त की केवल एक बैठक को ही आधार मानकर गणना की जाय तो मात्र दो विभागों को, भाषा विभाग द्वारा दिया गया ऋण एवं मूलधन वर्ष 2006 में ही 20 करोड़ से अधिक आता है और यदि अन्य विभाग को भी इस निधि से दिये गये ऋण को जोड़ दिया जाय तो यह धनराशि 2015 तक एक अनुमान के अनुसार अरबों में पहुंच जाती है। इस विशाल धनराशि का क्या हुआ, इसकी जानकारी आखिर किसके पास है। भाषा विभाग के पास जिसकी मूलपूँजी है या वित्त विभाग के पास जो सरकार के राजस्व और वित्त का प्रबंधन देखता है। अखिलेश सरकार ने पिछले 5 वर्षाें में इस फंड का क्या किया। इसकी जानकारी किसी को नहीं है। जब कि वे स्वयं भाषा विभाग के भी मंत्री थे। अब नये योगीराज में वर्षों से लापता इस ‘फण्ड’ को क्या भाषा विभाग ढूढ़ पायेगा या इसे खोजनेे के लिए दुनिया के सबसे बडे़ सर्च इंजन गूगल को ही लगाना पडेगा। आखिर सूबे के साहित्य अनुरागियों को यह कैसे पता चलेगा कि विभाग ने बीते कालखण्ड में इस फंड का क्या किया, किसे ऋण दिया, किससे ब्याज लिया और कहां, कितना बकाया है। इसकी जानकारी क्या विभाग के मंत्री (मुख्यमंत्री) को भी है। यदि नहीं तो यह, कौन पूछेगा योगी जी कि ‘भाषा निधि’ कहां गई?

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