मुखराम सिंह होने का मतलब जीवटता और जिजीविषा का मिलन

पचास के दशक में जन सरोकारों को लेकर जिस एक जुझारु और मिशनरी पत्रकार ने आजमगढ़ के वायुमंडल में सिंह गर्जना की, और उसके लिए लेखनी को हथियार बना, कागज के कुरुक्षेत्र में उतरा गया, उस दिलेर और जांबाज कलम के सिपाही का नाम मुखराम सिंह ही था। वो मुखराम, जिसकी भाषा में अविरल गंगा का सा प्रवाह और यमुना सा ओज था। वे भाषा को चेरी बना, जब उस पर विचारों की इमारत खड़ी करते, तो पाठक भावों की अतल गहराईयों में डूब जाता

अरविंद सिंह
मुखराम सिंह होने का मतलब जीवटता और जिजीविषा का मिलन, साहित्य और पत्रकारिता का संगम, भाषा और भाव का अनूठा मिलन, कुशल आंचलिक चितेरा की भावभूमि की तड़प और उस तड़प में सृजन और रचने की असीम बेचैनी की अभिव्यक्ति । गुलाम भारत में जन्में (1919), गुलामी की पीडा को महसूस करने और उससे निजात पाने की असीम पीड़ा और परिवेश की विचारभूमि में जवां होते जज्बातों ने बालक मुखराम का निर्माण किया। स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है जैसे नैसर्गिक और क्रांतिकारी (तत्कालीन) विचारों के आवेग और उसके प्रभाव में बचपन से किशोरवय में प्रवेश करते हुए मुखराम ने यह मान लिया था कि शांति के लिए क्रांति उतना ही जरुरी है, जितना जीवन के लिए जल। यही कारण है चालीस के दशक(1939) में ही जब इनके कलम की रौशनाई से इबारत निकली तो उसमें क्रांति और शांति दोनों साथ साथ पलने लगीं। ये भाव जैसे उनकी बगलगीर बन गये।
– पचास के दशक में जन सरोकारों को लेकर जिस एक जुझारु और मिशनरी पत्रकार ने आजमगढ़ के वायुमंडल में सिंह गर्जना की, और उसके लिए लेखनी को हथियार बना, कागज के कुरुक्षेत्र में उतरा गया, उस दिलेर और जांबाज कलम के सिपाही का नाम मुखराम सिंह ही था। वो मुखराम, जिसकी भाषा में अविरल गंगा का सा प्रवाह और यमुना सा ओज था। वे भाषा को चेरी बना, जब उस पर विचारों की इमारत खड़ी करते, तो पाठक भावों की अतल गहराईयों में डूब जाता। जन पक्षधरता इतनी की जन के लिए कलम को ही हथियार बना दिया। आजमगढ़ के चर्चित कचहरी कांड पर जब मुखराम सिंह की कलम चली तो लाखों जन की पीडा को जैसे स्वर मिल गया हो। पुलिस के ज्यादतियों पर खाकी वर्दी पुलिस की गुंडागर्दी जैसी बैनर शीर्षक देकर पुलिस प्रशासन को करारा जवाब देने वाले मुखराम सिंह, चुनाव के समय जनमत संग्रह के लिए 20-25 किमी जमीन को तो पैदल ही नाप देते थे। उनकी चुनावी समीक्षाएं और रिपोर्टे इतनी सारगर्भित और सटीक हुआ करती थीं कि पाठक तो पाठक, संपादक भी लोहा मानते थे।अपनी मेधा और उपाधियों के आधार पर सन् 1951 में आजमगढ़ जनपद के तत्कालीन प्रतिष्ठित वेस्ली इंटरमीडिएट कालेज में हिंदी अध्यापक के रूप में अपने अध्यापन जीवन की शुरूआत की और अपनी विचार सत्ता को और अधिक सशक्त ढ़ंग से आगे बढ़ाया।
मुखराम सिंह कवि हैं, गद्यकार हैं, लोक साहित्यकार हैं,या एक क्रांतिकारी पत्रकार कहना कठिन होगा। लेकिन यह सोलह आने सच है कि जिस वक्त वह, जिस भी भूमिका में होते, उस भूमिका में उनका कलमकार उभरकर सामने आ जाता है। जब एक लोक चितेरा की भूमिका में आते हैं तो लोक के प्रति उनकी तड़प और जिम्मेेदारी के दर्शन होते हैं। उनकी मान्यता थी कि हमारा लोक बहुत विराट है। जब भोजपुरी विरही बिसराम की तड़प और मनोदशा पर कलम चलाते हैं तो बिसराम के मुख से उनके बिरहों को सुनकर उनका संकलन करने निकल पडते हैं। बिसराम के बिरहे में लोक कवि बिसराम की पत्नी का भरी जवानी में मृत्यु और इस सदमें में अर्द्धविक्षिप्त बिसराम के जीवन की तड़प को महसूस करना और उस मनोदशा में उनके मुख से निकले बिरह वेदना, भोजपुरी साहित्य के अमर गीत हैं । बिसराम के विरह और व्याकुलता को देखकर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के गुरू बलदेव उपाध्याय जी उनकी तुलना अंग्रेजी साहित्य में कीट्स से करते हैं। वे उन्हे भोजपुरी का कीट्स कहते हैं। यह मुखराम ही थे जिन्होंने उस बिसराम के बिरहों का संकलन किया और उसका भाष्यकार के रूप में उन पर एक किताब सन 1965में ग्यानमंडल काशीें से प्रकाशित कराई, जिसकी भूमिका स्वयं तत्कालीन आज हिंदी दैनिक के सहायक संपादक ईश्वरचंद्र सिंहा और बलदेव उपाध्याय जी ने लिखी है। और भोजपुरी संसद काशी ने मुद्रित की। इस किताब की भूमिका में जिस प्रकार उन्होंने आजमगढ़ की भोजपुरी और लोक साहित्य के इतिहास को उकेरा है वह उनकी जानकारी,अन्वेषण और कुशल साहित्यकार का परिचायक है।
सत्तर के दशक तक(1969) ‘आज’ अखबार के माध्यम से जन की पीडा को निरंतर अभिव्यक्ति किया। उनके एक एक शब्द व्याकरण की कसौटी पर जहां खरा उतरते, वहीं भाषा पर उनकी चमत्कारिक पकड़ से समाचार और विचार, जन सामान्य को अपने से बाध देती।
स्वाभाव से कडक मुखराम सिंह अपने समय के सूर्य थें। पत्रकार धनुषधारी सिंह के साथ गहरे रिश्तों को अंतिम समय तक निभाया और जनवार्ता में दोनों ने खूब कलम को धार दिया। बहुत कम लोग ही यह जानते होगे कि अपने समय(1984 में प्रारंभ) प्रसिद्ध आजमगढ़ का ‘रणतूर्य’ अखबार का नामकरण (टाइटल) स्वय मुखराम सिंह ने किया था और अंतिम समय तक इस अखबार का संपादकीय विभाग संभालते रहे।
अपने लेखों और तेवरों के लिए प्रसिद्ध मुखराम सिंह ने कभी हार नहीं माना । जीवन में पत्रकारिता के जिन सिद्धांतों और मानदंडों को अपनाया,उसे जीवन पर्यंत निभाया।श्जनश् के लिए उठी मुखराम सिंह की कलम, अंतिम समय तक श्जनश् के लिए संघर्ष करती रही।शहर से सटे जयरामपुर गांव जिन अलग अलग कारणों से जाना जाता है। उसमें से एक प्रमुख कारण मुखराम सिंह का जन्मस्थान होना भी है। उनकी शिष्य परंपरा में उन्होंने ना जाने कितनो को गढा, माजा और कलम पकडना सिखाया,जो आगे चलकर अच्छे पत्रकार और संपादक भी बने। लेकिन वाह रे समय! किसी ने भी उन्हें याद करने की जहमत तक नहीं उठायी। आज समय कितना निर्मम हो चुका है कि लोग अपने नायकों और आदर्शों तक को भूलते जा रहे हैं। अपने इतिहास को गर्व करना जिस पीढी का संस्कार होना चाहिये आज उन इतिहास निर्माताओं को कोई याद करने वाला ही नहीं। आज मुखराम सिंह का जीवन संघर्ष आने वाली पीढियों को याद करना तो दूर ,वह संघर्ष गुमनामी की अंधकूप में है।ऐसे में आजमगढ़ जर्नलिस्ट फेडरेशन उस महान पत्रकार की स्मृतियों को संजोने के लिए आगे आया यह एक सुकून भरा समाचार है।

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