ग़ज़ल-वो जो ताजा गुलाब जैसा है/महेन्द्र अश्क

वो जो ताजा गुलाब जैसा है

छू न लेना अजाब जैसा है
मैंने कानों से मयकशी की है
 जिक्र उसका शराब जैसा है
उसको पढ़ने में उम्र गुजरेगी
बो मुकम्मल किताब जैसा है
एक आहट से टूट जाता है
नींद का जिस्म ख़्वाब जैसा है
पाँव नीचे जमीन जलती है
सर पे कुछ आफताब जैसा है
अक्स किसका घुला है दरिया में
सारा पानी शराब जैसा है